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अमीर मीनाई

1829 - 1900 | हैदराबाद, भारत

दाग़ देहलवी के समकालीन। अपनी ग़ज़ल ' सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता ' के लिए प्रसिद्ध हैं।

दाग़ देहलवी के समकालीन। अपनी ग़ज़ल ' सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता ' के लिए प्रसिद्ध हैं।

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
जब से बुलबुल तू ने दो तिनके लिए

अमीर मीनाई

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बेगम अख़्तर

Na shauq e wasal ka da_wa

Na shauq e wasal ka da_wa मोहम्मद रफ़ी

उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ

उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ अमीर मीनाई

उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ

उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ विविध

ऐ ज़ब्त देख इश्क़ की उन को ख़बर न हो

ऐ ज़ब्त देख इश्क़ की उन को ख़बर न हो अज्ञात

जब से बुलबुल तू ने दो तिनके लिए

जब से बुलबुल तू ने दो तिनके लिए एजाज़ हुसैन हज़रावी

सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता

सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता जगजीत सिंह

सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता

सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता मेहरान अमरोही

सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता

सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता जाज़म शर्मा

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    उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ विविध

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    सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता मेहरान अमरोही

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