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अमीर मीनाई

1829 - 1900 | हैदराबाद, भारत

दाग़ देहलवी के समकालीन। अपनी ग़ज़ल ' सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता ' के लिए प्रसिद्ध हैं।

दाग़ देहलवी के समकालीन। अपनी ग़ज़ल ' सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता ' के लिए प्रसिद्ध हैं।

अमीर मीनाई के शेर

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कश्तियाँ सब की किनारे पे पहुँच जाती हैं

नाख़ुदा जिन का नहीं उन का ख़ुदा होता है

तुम को आता है प्यार पर ग़ुस्सा

मुझ को ग़ुस्से पे प्यार आता है

वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर

दिन गिने जाते थे इस दिन के लिए

गाहे गाहे की मुलाक़ात ही अच्छी है 'अमीर'

क़द्र खो देता है हर रोज़ का आना जाना

उल्फ़त में बराबर है वफ़ा हो कि जफ़ा हो

हर बात में लज़्ज़त है अगर दिल में मज़ा हो

ख़ंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम 'अमीर'

सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है

आफ़त तो है वो नाज़ भी अंदाज़ भी लेकिन

मरता हूँ मैं जिस पर वो अदा और ही कुछ है

कौन सी जा है जहाँ जल्वा-ए-माशूक़ नहीं

शौक़-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर

तीर खाने की हवस है तो जिगर पैदा कर

सरफ़रोशी की तमन्ना है तो सर पैदा कर

हुए नामवर बे-निशाँ कैसे कैसे

ज़मीं खा गई आसमाँ कैसे कैसे

हँस के फ़रमाते हैं वो देख के हालत मेरी

क्यूँ तुम आसान समझते थे मोहब्बत मेरी

माँग लूँ तुझ से तुझी को कि सभी कुछ मिल जाए

सौ सवालों से यही एक सवाल अच्छा है

अभी आए अभी जाते हो जल्दी क्या है दम ले लो

छेड़ूँगा मैं जैसी चाहे तुम मुझ से क़सम ले लो

किसी रईस की महफ़िल का ज़िक्र ही क्या है

ख़ुदा के घर भी जाएँगे बिन बुलाए हुए

आँखें दिखलाते हो जोबन तो दिखाओ साहब

वो अलग बाँध के रक्खा है जो माल अच्छा है

फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा

कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया उधर रक्खा

'अमीर' अब हिचकियाँ आने लगी हैं

कहीं मैं याद फ़रमाया गया हूँ

जो चाहिए सो माँगिये अल्लाह से 'अमीर'

उस दर पे आबरू नहीं जाती सवाल से

जवाँ होने लगे जब वो तो हम से कर लिया पर्दा

हया यक-लख़्त आई और शबाब आहिस्ता आहिस्ता

हटाओ आइना उम्मीद-वार हम भी हैं

तुम्हारे देखने वालों में यार हम भी हैं

कौन उठाएगा तुम्हारी ये जफ़ा मेरे बाद

याद आएगी बहुत मेरी वफ़ा मेरे बाद

अल्लाह-रे सादगी नहीं इतनी उन्हें ख़बर

मय्यत पे के पूछते हैं इन को क्या हुआ

फिर बैठे बैठे वादा-ए-वस्ल उस ने कर लिया

फिर उठ खड़ा हुआ वही रोग इंतिज़ार का

मानी हैं मैं ने सैकड़ों बातें तमाम उम्र

आज आप एक बात मेरी मान जाइए

वो दुश्मनी से देखते हैं देखते तो हैं

मैं शाद हूँ कि हूँ तो किसी की निगाह में

सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता

निकलता रहा है आफ़्ताब आहिस्ता आहिस्ता

तीर पर तीर लगाओ तुम्हें डर किस का है

सीना किस का है मिरी जान जिगर किस का है

मुश्किल बहुत पड़ेगी बराबर की चोट है

आईना देखिएगा ज़रा देख-भाल के

बोसा लिया जो उस लब-ए-शीरीं का मर गए

दी जान हम ने चश्मा-ए-आब-ए-हयात पर

बाद मरने के भी छोड़ी रिफ़ाक़त मेरी

मेरी तुर्बत से लगी बैठी है हसरत मेरी

ख़ुदा ने नेक सूरत दी तो सीखो नेक बातें भी

बुरे होते हो अच्छे हो के ये क्या बद-ज़बानी है

शाएर को मस्त करती है तारीफ़-ए-शेर 'अमीर'

सौ बोतलों का नश्शा है इस वाह वाह में

बाक़ी दिल में कोई भी या रब हवस रहे

चौदह बरस के सिन में वो लाखों बरस रहे

मिरा ख़त उस ने पढ़ा पढ़ के नामा-बर से कहा

यही जवाब है इस का कोई जवाब नहीं

आया एक बार अयादत को तू मसीह

सौ बार मैं फ़रेब से बीमार हो चुका

उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी सकूँ

ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी सकूँ

आहों से सोज़-ए-इश्क़ मिटाया जाएगा

फूँकों से ये चराग़ बुझाया जाएगा

सारी दुनिया के हैं वो मेरे सिवा

मैं ने दुनिया छोड़ दी जिन के लिए

समझता हूँ सबब काफ़िर तिरे आँसू निकलने का

धुआँ लगता है आँखों में किसी के दिल के जलने का

शब-ए-फ़ुर्क़त का जागा हूँ फ़रिश्तो अब तो सोने दो

कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता आहिस्ता

ये भी इक बात है अदावत की

रोज़ा रक्खा जो हम ने दावत की

तेरी मस्जिद में वाइज़ ख़ास हैं औक़ात रहमत के

हमारे मय-कदे में रात दिन रहमत बरसती है

है जवानी ख़ुद जवानी का सिंगार

सादगी गहना है इस सिन के लिए

ज़ब्त देखो उधर निगाह की

मर गए मरते मरते आह की

किस ढिटाई से वो दिल छीन के कहते हैं 'अमीर'

वो मिरा घर है रहे जिस में मोहब्बत मेरी

लुत्फ़ आने लगा जफ़ाओं में

वो कहीं मेहरबाँ हो जाए

पहलू में मेरे दिल को दर्द कर तलाश

मुद्दत हुई ग़रीब वतन से निकल गया

अच्छे ईसा हो मरीज़ों का ख़याल अच्छा है

हम मरे जाते हैं तुम कहते हो हाल अच्छा है

क़रीब है यारो रोज़-ए-महशर छुपेगा कुश्तों का ख़ून क्यूँकर

जो चुप रहेगी ज़बान-ए-ख़ंजर लहू पुकारेगा आस्तीं का

करता मैं दर्दमंद तबीबों से क्या रुजूअ

जिस ने दिया था दर्द बड़ा वो हकीम था