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अल्लामा इक़बाल

1877 - 1938 | लाहौर, पाकिस्तान

महान उर्दू शायर एवं पाकिस्तान के राष्ट्र-क़वि जिन्होंने 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा ' के अतिरिक्त 'लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी' जैसे गीत की रचना की

महान उर्दू शायर एवं पाकिस्तान के राष्ट्र-क़वि जिन्होंने 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा ' के अतिरिक्त 'लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी' जैसे गीत की रचना की

ग़ज़ल 116

नज़्म 433

शेर 120

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले

ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल

लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे

रुबाई 10

क़ितआ 3

 

लतीफ़े 13

ई-पुस्तक 842

1985 Ka Iqbaliyati Adab Ek Jaiza

 

1986

ए वॉइस फ्रॉम दी ईस्ट

दी पोइट्री ऑफ़ इक़बाल

1982

अाईना-ए-इक़बाल

तज़्मीनात बर-कलाम-ए-इक़बाल

1973

अाईना-ए-इक़बालियात

खण्ड-001

1999

Aap Beeti Allama Iqbal

 

2015

Adabi Duniya,Lahore

Iqbal Number: Shumara Number-024

 

अफ़्कार-ए-इक़बाल

 

2001

अफ़्कार-ए-इक़बाल

 

1986

Afkar-e-Iqbal

 

1977

अफ़्कार-ए-इक़बाल

 

2011

चित्र शायरी 19

दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ या रब क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो शोरिश से भागता हूँ दिल ढूँडता है मेरा ऐसा सुकूत जिस पर तक़रीर भी फ़िदा हो मरता हूँ ख़ामुशी पर ये आरज़ू है मेरी दामन में कोह के इक छोटा सा झोंपड़ा हो आज़ाद फ़िक्र से हूँ उज़्लत में दिन गुज़ारूँ दुनिया के ग़म का दिल से काँटा निकल गया हो लज़्ज़त सरोद की हो चिड़ियों के चहचहों में चश्मे की शोरिशों में बाजा सा बज रहा हो गुल की कली चटक कर पैग़ाम दे किसी का साग़र ज़रा सा गोया मुझ को जहाँ-नुमा हो हो हाथ का सिरहाना सब्ज़े का हो बिछौना शरमाए जिस से जल्वत ख़ल्वत में वो अदा हो मानूस इस क़दर हो सूरत से मेरी बुलबुल नन्हे से दिल में उस के खटका न कुछ मिरा हो सफ़ बाँधे दोनों जानिब बूटे हरे हरे हों नद्दी का साफ़ पानी तस्वीर ले रहा हो हो दिल-फ़रेब ऐसा कोहसार का नज़ारा पानी भी मौज बन कर उठ उठ के देखता हो आग़ोश में ज़मीं की सोया हुआ हो सब्ज़ा फिर फिर के झाड़ियों में पानी चमक रहा हो पानी को छू रही हो झुक झुक के गुल की टहनी जैसे हसीन कोई आईना देखता हो मेहंदी लगाए सूरज जब शाम की दुल्हन को सुर्ख़ी लिए सुनहरी हर फूल की क़बा हो रातों को चलने वाले रह जाएँ थक के जिस दम उम्मीद उन की मेरा टूटा हुआ दिया हो बिजली चमक के उन को कुटिया मिरी दिखा दे जब आसमाँ पे हर सू बादल घिरा हुआ हो पिछले पहर की कोयल वो सुब्ह की मोअज़्ज़िन मैं उस का हम-नवा हूँ वो मेरी हम-नवा हो कानों पे हो न मेरे दैर ओ हरम का एहसाँ रौज़न ही झोंपड़ी का मुझ को सहर-नुमा हो फूलों को आए जिस दम शबनम वज़ू कराने रोना मिरा वज़ू हो नाला मिरी दुआ हो इस ख़ामुशी में जाएँ इतने बुलंद नाले तारों के क़ाफ़िले को मेरी सदा दिरा हो हर दर्दमंद दिल को रोना मिरा रुला दे बेहोश जो पड़े हैं शायद उन्हें जगा दे

न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए जहाँ है तेरे लिए तू नहीं जहाँ के लिए ये अक़्ल ओ दिल हैं शरर शोला-ए-मोहब्बत के वो ख़ार-ओ-ख़स के लिए है ये नीस्ताँ के लिए मक़ाम-ए-परवरिश-ए-आह-ओ-लाला है ये चमन न सैर-ए-गुल के लिए है न आशियाँ के लिए रहेगा रावी ओ नील ओ फ़ुरात में कब तक तिरा सफ़ीना कि है बहर-ए-बे-कराँ के लिए निशान-ए-राह दिखाते थे जो सितारों को तरस गए हैं किसी मर्द-ए-राह-दाँ के लिए निगह बुलंद सुख़न दिल-नवाज़ जाँ पुर-सोज़ यही है रख़्त-ए-सफ़र मीर-ए-कारवाँ के लिए ज़रा सी बात थी अंदेशा-ए-अजम ने उसे बढ़ा दिया है फ़क़त ज़ेब-ए-दास्ताँ के लिए मिरे गुलू में है इक नग़्मा जिब्राईल-आशोब संभाल कर जिसे रक्खा है ला-मकाँ के लिए

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कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में

नुसरत फ़तह अली ख़ान

कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में

अज्ञात

कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में

ग़ुलाम अली

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ख़ुदी की शोख़ी ओ तुंदी में किब्र-ओ-नाज़ नहीं

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ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं

ग़ुलाम अली

ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं

अज्ञात

ख़िरद के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहीं

विठल राव

ख़िर्द-मंदों से क्या पूछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है

अज्ञात

गुलज़ार-ए-हस्त-ओ-बूद न बेगाना-वार देख

नाशनास

गेसू-ए-ताबदार को और भी ताबदार कर

फरीहा परवेज़

जवाब-ए-शिकवा

दिल से जो बात निकलती है असर रखती है नुसरत फ़तह अली ख़ान

जवाब-ए-शिकवा

दिल से जो बात निकलती है असर रखती है अज्ञात

जवाब-ए-शिकवा

दिल से जो बात निकलती है असर रखती है आबिद अली बेग

जावेद के नाम

दयार-ए-इश्क़ में अपना मक़ाम पैदा कर नुसरत फ़तह अली ख़ान

जिब्रईल ओ इबलीस

जिब्रईल ज़ुल्फ़िक़ार अली बुख़ारी

ज़ौक़ ओ शौक़

क़ल्ब ओ नज़र की ज़िंदगी दश्त में सुब्ह का समाँ ज़ुल्फ़िक़ार अली बुख़ारी

तू अभी रहगुज़र में है क़ैद-ए-मक़ाम से गुज़र

जव्वाद अहमद

तुझे याद क्या नहीं है मिरे दिल का वो ज़माना

मासूमा अनवर

तराना-ए-हिन्दी

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा लता मंगेशकर

तुलू-ए-इस्लाम

दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबी ग़ुलाम अली

तस्वीर-ए-दर्द

नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शुनीदन दास्ताँ मेरी अज्ञात

तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ

राधिका चोपड़ा

तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ

ताहिरा सैयद

दिगर-गूँ है जहाँ तारों की गर्दिश तेज़ है साक़ी

अली रज़ा

न आते हमें इस में तकरार क्या थी

फ़रीदा ख़ानम

न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए

मसूद राणा

न तख़्त-ओ-ताज में ने लश्कर-ओ-सिपाह में है

अज्ञात

नया शिवाला

सच कह दूँ ऐ बरहमन गर तू बुरा न माने अब्दुल अहद साज़

निगाह-ए-फ़क़्र में शान-ए-सिकंदरी क्या है

शौकत अली

परेशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए

सनम मरवी

फ़ितरत को ख़िरद के रू-ब-रू कर

अज्ञात

फ़ितरत ने न बख़्शा मुझे अंदेशा-ए-चालाक

तरन्नुम नाज़

फिर चराग़-ए-लाला से रौशन हुए कोह ओ दमन

नाहीद अख़्तर

बच्चे की दुआ

लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी विविध

मजनूँ ने शहर छोड़ा तो सहरा भी छोड़ दे

अज्ञात

मुझे आह-ओ-फ़ुग़ान-ए-नीम-शब का फिर पयाम आया

हामिद अली ख़ान

मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ूमंदी

अज्ञात

मेरी नवा-ए-शौक़ से शोर हरीम-ए-ज़ात में

मोहम्मद अली

मुसलमाँ के लहू में है सलीक़ा दिल-नवाज़ी का

अज्ञात

मार्च 1907

ज़माना आया है बे-हिजाबी का आम दीदार-ए-यार होगा ज़िया मोहीउद्दीन

मिटा दिया मिरे साक़ी ने आलम-ए-मन-ओ-तू

अज्ञात

मिर्ज़ा 'ग़ालिब'

फ़िक्र-ए-इंसाँ पर तिरी हस्ती से ये रौशन हुआ नसीरुद्दीन शाह

मोहब्बत

उरूस-ए-शब की ज़ुल्फ़ें थीं अभी ना-आश्ना ख़म से ज़िया मोहीउद्दीन

ये पयाम दे गई है मुझे बाद-ए-सुब्ह-गाही

शफ़क़त अमानत अली

लेनिन

ऐ अन्फ़ुस ओ आफ़ाक़ में पैदा तिरी आयात ज़ुल्फ़िक़ार अली बुख़ारी

ला फिर इक बार वही बादा ओ जाम ऐ साक़ी

ज़िया मोहीउद्दीन

वही मेरी कम-नसीबी वही तेरी बे-नियाज़ी

नय्यरा नूर

वालिदा मरहूमा की याद में

ज़र्रा ज़र्रा दहर का ज़िंदानी-ए-तक़दीर है ज़ुल्फ़िक़ार अली बुख़ारी

वो हर्फ़-ए-राज़ कि मुझ को सिखा गया है जुनूँ

मेहदी हसन

शिकवा

क्यूँ ज़याँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँ नुसरत फ़तह अली ख़ान

शिकवा

क्यूँ ज़याँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँ नुसरत फ़तह अली ख़ान

शिकवा

क्यूँ ज़याँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँ नुसरत फ़तह अली ख़ान

शिकवा

क्यूँ ज़याँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँ नुसरत फ़तह अली ख़ान

शिकवा

क्यूँ ज़याँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँ नुसरत फ़तह अली ख़ान

शिकवा

क्यूँ ज़याँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँ नुसरत फ़तह अली ख़ान

शिकवा

क्यूँ ज़याँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँ ज़िया मोहीउद्दीन

शिकवा

क्यूँ ज़याँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँ आबिद अली बेग

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

राहत फ़तह अली

सीमा सहगल

सीमा सहगल

हज़ार ख़ौफ़ हो लेकिन ज़बाँ हो दिल की रफ़ीक़

अज्ञात

हर चीज़ है महव-ए-ख़ुद-नुमाई

इक़बाल बानो

हर शय मुसाफ़िर हर चीज़ राही

समीना ज़ाहिद

हादसा वो जो अभी पर्दा-ए-अफ़्लाक में है

मेहदी हसन

हिन्दुस्तानी बच्चों का क़ौमी गीत

चिश्ती ने जिस ज़मीं में पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया अज्ञात

जब इश्क़ सिखाता है आदाब-ए-ख़ुद-आगाही

हिना नसरुल्लाह

तराना-ए-हिन्दी

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा विविध

परेशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए

मेहदी हसन

ऑडियो 59

अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमाँ तेरा है या मेरा

अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा था मैं

कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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