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अख़्तर शीरानी

1905 - 1948 | लाहौर, पाकिस्तान

सबसे लोकप्रिय उर्दू शायरों में से एक। गहरी रूमानी शायरी के लिए प्रसिद्ध

सबसे लोकप्रिय उर्दू शायरों में से एक। गहरी रूमानी शायरी के लिए प्रसिद्ध

ग़ज़ल 53

नज़्म 17

शेर 50

काँटों से दिल लगाओ जो ता-उम्र साथ दें

फूलों का क्या जो साँस की गर्मी सह सकें

befriend the thorns for they will be loyal until death

what of these flowers that will wilt with just a burning breath

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ग़म-ए-ज़माना ने मजबूर कर दिया वर्ना

ये आरज़ू थी कि बस तेरी आरज़ू करते

इन्ही ग़म की घटाओं से ख़ुशी का चाँद निकलेगा

अँधेरी रात के पर्दे में दिन की रौशनी भी है

हास्य 1

 

क़ितआ 1

 

रुबाई 3

 

पुस्तकें 36

अदबिस्तान

 

 

Adabistan

 

1930

Akhtar Sheerani

 

1991

Akhtar Shirani

Intikhab-e-Kalam Akhtar Shirani

1956

अख़्तर शीरानी और उसकी शायरी

 

1964

Akhtar Shirani: Intikhab-e-Kalam

 

1959

Akhtaristan

 

1946

Intikhab-e-Kalam Akhtar Sheerani

 

1959

Intikhab-e-Kalam-e-Akhtar Shirani

 

 

javaam-ul-Hikayaat-o-Lawame-ur-Riwayat

Volume-001

1943

चित्र शायरी 10

ऐ इश्क़ कहीं ले चल इस पाप की बस्ती से नफ़रत-गह-ए-आलम से ल'अनत-गह-ए-हस्ती से इन नफ़्स-परस्तों से इस नफ़्स-परस्ती से दूर और कहीं ले चल! ऐ इश्क़ कहीं ले चल! हम प्रेम पुजारी हैं तो प्रेम कन्हैय्या है तो प्रेम कन्हैय्या है ये प्रेम की नय्या है ये प्रेम की नय्या है तू इस का खेवय्या है कुछ फ़िक्र नहीं ले चल! ऐ इश्क़ कहीं ले चल! बे-रहम ज़माने को अब छोड़ रहे हैं हम बेदर्द अज़ीज़ों से मुँह मोड़ रहे हैं हम जो आस कि थी वो भी अब तोड़ रहे हैं हम बस ताब नहीं ले चल! ऐ इश्क़ कहीं ले चल! ये जब्र-कदा आज़ाद अफ़्कार का दुश्मन है अरमानों का क़ातिल है उम्मीदों का रहज़न है जज़्बात का मक़्तल है जज़्बात का मदफ़न है चल याँ से कहीं ले चल! ऐ इश्क़ कहीं ले चल! आपस में छल और धोके संसार की रीतें हैं इस पाप की नगरी में उजड़ी हुई परतें हैं याँ न्याय की हारें हैं अन्याय की जीतें हैं सुख चैन नहीं ले चल! ऐ इश्क़ कहीं ले चल! इक मज़बह-ए-जज़्बात-ओ-अफ़्कार है ये दुनिया इक मस्कन-ए-अशरार-ओ-आज़ार है ये दुनिया इक मक़्तल-ए-अहरार-ओ-अबरार है ये दुनिया दूर इस से कहीं ले चल! ऐ इश्क़ कहीं ले चल! ये दर्द भरी दुनिया बस्ती है गुनाहों की दिल-चाक उमीदों की सफ़्फ़ाक निगाहों की ज़ुल्मों की जफ़ाओं की आहों की कराहों की हैं ग़म से हज़ीं ले चल! ऐ इश्क़ कहीं ले चल! आँखों में समाई है इक ख़्वाब-नुमा दुनिया तारों की तरह रौशन महताब-नुमा दिया जन्नत की तरह रंगीं शादाब-नुमा दुनिया लिल्लाह वहीं ले चल! ऐ इश्क़ कहीं ले चल! वो तीर हो सागर की रुत छाई हो फागुन की फूलों से महकती हो पुर्वाई घने बन की या आठ पहर जिस में झड़ बदली हो सावन की जी बस में नहीं ले चल! ऐ इश्क़ कहीं ले चल! क़ुदरत हो हिमायत पर हमदर्द हो क़िस्मत भी 'सलमा' भी हो पहलू में 'सलमा' की मोहब्बत भी हर शय से फ़राग़त हो और तेरी इनायत भी ऐ तिफ़्ल-ए-हसीं ले चल! ऐ इश्क़ कहीं ले चल! ऐ इश्क़ हमें ले चल इक नूर की वादी में इक ख़्वाब की दुनिया में इक तूर की वादी में हूरों के ख़यालात-ए-मसरूर की वादी में ता ख़ुल्द-ए-बरीं ले चल! ऐ इश्क़ कहीं ले चल! संसार के उस पार इक इस तरह की बस्ती हो जो सदियों से इंसाँ की सूरत को तरसती हो और जिस के नज़ारों पर तन्हाई बरसती हो यूँ हो तो वहीं ले चल! ऐ इश्क़ कहीं ले चल! मग़रिब की हवाओं से आवाज़ सी आती है और हम को समुंदर के उस पार बुलाती है शायद कोई तन्हाई का देस बताती है चल इस के क़रीं ले चल! ऐ इश्क़ कहीं ले चल! इक ऐसी फ़ज़ा जिस तक ग़म की न रसाई हो दुनिया की हवा जिस में सदियों से न आई हो ऐ इश्क़ जहाँ तू हो और तेरी ख़ुदाई हो ऐ इश्क़ वहीं ले चल! ऐ इश्क़ कहीं ले चल! एक ऐसी जगह जिस में इंसान न बस्ते हों ये मक्र ओ जफ़ा-पेशा हैवान न बस्ते हों इंसाँ की क़बा में ये शैतान न बस्ते हों तो ख़ौफ़ नहीं ले चल! ऐ इश्क़ कहीं ले चल! बरसात की मतवाली घनघोर घटाओं में कोहसार के दामन की मस्ताना हवाओं में या चाँदनी रातों की शफ़्फ़ाफ़ फ़ज़ाओं में ऐ ज़ोहरा-जबीं ले चल! ऐ इश्क़ कहीं ले चल! इन चाँद सितारों के बिखरे हुए शहरों में इन नूर की किरनों की ठहरी हुई नहरों में ठहरी हुई नहरों में सोई हुई लहरों में ऐ ख़िज़्र-ए-हसीं ले चल! ऐ इश्क़ कहीं ले चल! इक ऐसी बहिश्त आईं वादी में पहुँच जाएँ जिस में कभी दुनिया के ग़म दिल को न तड़पाएँ और जिस की बहारों में जीने के मज़े आएँ ले चल तू वहीं ले चल! ऐ इश्क़ कहीं ले चल!

ऐ दिल वो आशिक़ी के फ़साने किधर गए वो उम्र क्या हुई वो ज़माने किधर गए वीराँ हैं सहन ओ बाग़ बहारों को क्या हुआ वो बुलबुलें कहाँ वो तराने किधर गए है नज्द में सुकूत हवाओं को क्या हुआ लैलाएँ हैं ख़मोश दिवाने किधर गए उजड़े पड़े हैं दश्त ग़ज़ालों पे क्या बनी सूने हैं कोहसार दिवाने किधर गए वो हिज्र में विसाल की उम्मीद क्या हुई वो रंज में ख़ुशी के बहाने किधर गए दिन रात मय-कदे में गुज़रती थी ज़िंदगी 'अख़्तर' वो बे-ख़ुदी के ज़माने किधर गए

ओ देस से आने वाला है बता ओ देस से आने वाले बता किस हाल में हैं यारान-ए-वतन आवारा-ए-ग़ुर्बत को भी सुना किस रंग में है कनआन-ए-वतन वो बाग़-ए-वतन फ़िरदौस-ए-वतन वो सर्व-ए-वतन रैहान-ए-वतन ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या अब भी वहाँ के बाग़ों में मस्ताना हवाएँ आती हैं क्या अब भी वहाँ के पर्बत पर घनघोर घटाएँ छाती हैं क्या अब भी वहाँ की बरखाएँ वैसे ही दिलों को भाती हैं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या अब भी वतन में वैसे ही सरमस्त नज़ारे होते हैं क्या अब भी सुहानी रातों को वो चाँद सितारे होते हैं हम खेल जो खेला करते थे क्या अब वही सारे होते हैं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या अब भी शफ़क़ के सायों में दिन रात के दामन मिलते हैं क्या अब भी चमन में वैसे ही ख़ुश-रंग शगूफ़े खिलते हैं बरसाती हवा की लहरों से भीगे हुए पौदे हिलते हैं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता शादाब-ओ-शगुफ़्ता फूलों से मामूर हैं गुलज़ार अब कि नहीं बाज़ार में मालन लाती है फूलों के गुँधे हार अब कि नहीं और शौक़ से टूटे पड़ते हैं नौ-उम्र ख़रीदार अब कि नहीं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या शाम पड़े गलियों में वही दिलचस्प अँधेरा होता है और सड़कों की धुँदली शम्ओं पर सायों का बसेरा होता है बाग़ों की घनेरी शाख़ों में जिस तरह सवेरा होता है ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या अब भी वहाँ वैसी ही जवाँ और मध-भरी रातें होती हैं क्या रात भर अब भी गीतों की और प्यार की बातें होती हैं वो हुस्न के जादू चलते हैं वो इश्क़ की घातें होती हैं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता मीरानियों के आग़ोश में है आबाद वो बाज़ार अब कि नहीं तलवारें बग़ल में दाबे हुए फिरते हैं तरहदार अब कि नहीं और बहलियों में से झाँकते हैं तुर्कान-ए-सियह-कार अब कि नहीं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या अब भी महकते मंदिर से नाक़ूस की आवाज़ आती है क्या अब भी मुक़द्दस मस्जिद पर मस्ताना अज़ाँ थर्राती है और शाम के रंगीं सायों पर अज़्मत की झलक छा जाती है ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाला बता क्या अब भी वहाँ के पनघट पर पनहारियाँ पानी भरती हैं अंगड़ाई का नक़्शा बन बन कर सब माथे पे गागर धरती हैं और अपने घरों को जाते हुए हँसती हुई चुहलें करती हैं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता बरसात के मौसम अब भी वहाँ वैसे ही सुहाने होते हैं क्या अब भी वहाँ के बाग़ों में झूले और गाने होते हैं और दूर कहीं कुछ देखते ही नौ-उम्र दीवाने होते हैं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या अब भी पहाड़ी चोटियों पर बरसात के बादल छाते हैं क्या अब भी हवा-ए-साहिल के वो रस भरे झोंके आते हैं और सब से ऊँची टीकरी पर लोग अब भी तराने गाते हैं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या अब भी पहाड़ी घाटियों में घनघोर घटाएँ गूँजती हैं साहिल के घनेरे पेड़ों में बरखा की हवाएँ गूँजती हैं झींगुर के तराने जागते हैं मोरों की सदाएँ गूँजती हैं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या अब भी वहाँ मेलों में वही बरसात का जौबन होता है फैले हुए बड़ की शाख़ों में झूलों का नशेमन होता है उमडे हुए बादल होते हैं छाया हुआ सावन होता है ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या शहर के गिर्द अब भी है रवाँ दरिया-ए-हसीं लहराए हुए जूँ गोद में अपने मन को लिए नागिन हो कोई थर्राए हुए या नूर की हँसुली हूर की गर्दन में हो अयाँ बिल खाए हुए ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या अब भी फ़ज़ा के दामन में बरखा के समय लहराते हैं क्या अब भी कनार-ए-दरिया पर तूफ़ान के झोंके आते हैं क्या अब भी अँधेरी रातों में मल्लाह तराने गाते हैं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या अब भी वहाँ बरसात के दिन बाग़ों में बहारें आती हैं मासूम ओ हसीं दोशीज़ाएँ बरखा के तराने गाती हैं और तीतरियों की तरह से रंगीं झूलों पर लहराती हैं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या अब भी उफ़ुक़ के सीने पर शादाब घटाएँ झूमती हैं दरिया के किनारे बाग़ों में मस्ताना हवाएँ झूमती हैं और उन के नशीले झोंकों से ख़ामोश फ़ज़ाएँ झूमती हैं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या शाम को अब भी जाते हैं अहबाब कनार-ए-दरिया पर वो पेड़ घनेरे अब भी हैं शादाब कनार-ए-दरिया पर और प्यार से आ कर झाँकता है महताब कनार-ए-दरिया पर ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या आम के ऊँचे पेड़ों पर अब भी वो पपीहे बोलते हैं शाख़ों के हरीरी पर्दों में नग़्मों के ख़ज़ाने घोलते हैं सावन के रसीले गीतों से तालाब में अमरस घोलते हैं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या पहली सी है मासूम अभी वो मदरसे की शादाब फ़ज़ा कुछ भूले हुए दिन गुज़रे हैं जिस में वो मिसाल-ए-ख़्वाब फ़ज़ा वो खेल वो हम-सिन वो मैदाँ वो ख़्वाब-गह-ए-महताब फ़ज़ा ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या अब भी किसी के सीने में बाक़ी है हमारी चाह बता क्या याद हमें भी करता है अब यारों में कोई आह बता ओ देस से आने वाले बता लिल्लाह बता लिल्लाह बता ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या हम को वतन के बाग़ों की मस्ताना फ़ज़ाएँ भूल गईं बरखा की बहारें भूल गईं सावन की घटाएँ भूल गईं दरिया के किनारे भूल गए जंगल की हवाएँ भूल गईं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या गाँव में अब भी वैसी ही मस्ती-भरी रातें आती हैं देहात की कमसिन माह-वशें तालाब की जानिब जाती हैं और चाँद की सादा रौशनी में रंगीन तराने गाती हैं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या अब भी गजर-दम चरवाहे रेवड़ को चुराने जाते हैं और शाम के धुँदले सायों के हमराह घरों को आते हैं और अपनी रसीली बांसुरियों में इश्क़ के नग़्मे गाते हैं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या गाँव पे अब भी सावन में बरखा की बहारें छाती हैं मासूम घरों से भोर-भैए चक्की की सदाएँ आती हैं और याद में अपने मैके की बिछड़ी हुई सखियाँ गाती हैं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता दरिया का वो ख़्वाब-आलूदा सा घाट और उस की फ़ज़ाएँ कैसी हैं वो गाँव वो मंज़र वो तालाब और उस की हवाएँ कैसी हैं वो खेत वो जंगल वो चिड़ियाँ और उन की सदाएँ कैसी हैं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या अब भी पुराने खंडरों पर तारीख़ की इबरत तारी है अन्नपूर्णा के उजड़े मंदिर पर मायूसी-ओ-हसरत तारी है सुनसान घरों पर छावनी के वीरानी ओ रिक़्क़त तारी है ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता आख़िर में ये हसरत है कि बता वो ग़ारत-ए-ईमाँ कैसी है बचपन में जो आफ़त ढाती थी वो आफ़त-ए-दौराँ कैसी है हम दोनों थे जिस के परवाने वो शम-ए-शबिस्ताँ कैसी है ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता मरजाना था जिस का नाम बता वो ग़ुंचा-दहन किस हाल में है जिस पर थे फ़िदा तिफ़्लान-ए-वतन वो जान-ए-वतन किस हाल में है वो सर्व-ए-चमन वो रश्क-ए-समन वो सीम-बदन किस हाल में है ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या अब भी रुख़-ए-गुलरंग पे वो जन्नत के नज़ारे रौशन हैं क्या अब भी रसीली आँखों में सावन के सितारे रौशन हैं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता क्या अब भी शहाबी आरिज़ पर गेसू-ए-सियह बिल खाते हैं या बहर-ए-शफ़क़ की मौजों पर दो नाग पड़े लहराते हैं और जिन की झलक से सावन की रातों के सपने आते हैं ओ देस से आने वाले बता ओ देस से आने वाले बता अब नाम-ए-ख़ुदा होगी वो जवाँ मैके में है या ससुराल गई दोशीज़ा है या आफ़त में उसे कम-बख़्त जवानी डाल गई घर पर ही रही या घर से गई ख़ुश-हाल रही ख़ुश-हाल गई ओ देस से आने वाले बता

उठते नहीं हैं अब तो दुआ के लिए भी हाथ किस दर्जा ना-उमीद हैं परवरदिगार से

काँटों से दिल लगाओ जो ता-उम्र साथ दें फूलों का क्या जो साँस की गर्मी न सह सकें

 

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Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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