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अख़्तर शीरानी

1905 - 1948 | लाहौर, पाकिस्तान

सबसे लोकप्रिय उर्दू शायरों में से एक। गहरी रूमानी शायरी के लिए प्रसिद्ध

सबसे लोकप्रिय उर्दू शायरों में से एक। गहरी रूमानी शायरी के लिए प्रसिद्ध

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Ai ishq hamen barbad na kar

Ai ishq hamen barbad na kar मलिका पुखराज

Ai Ishq Humhein Barbad na Kar

Ai Ishq Humhein Barbad na Kar नय्यरा नूर

Bhulaoge bahut lekin tumhen ham yaad

Bhulaoge bahut lekin tumhen ham yaad मुन्नी बेगम

Har ek jalwa e rangeen meri nigah mein hai

Har ek jalwa e rangeen meri nigah mein hai ताहिरा सैयद

ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर

ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर नय्यरा नूर

ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता सय्नायद सिर जहाँ

ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता आबिदा परवीन

कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता

कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता इक़बाल बानो

क्या कह गई किसी की नज़र कुछ न पूछिए

क्या कह गई किसी की नज़र कुछ न पूछिए हबीब वली मोहम्मद

निकहत-ए-ज़ुल्फ़ से नींदों को बसा दे आ कर

निकहत-ए-ज़ुल्फ़ से नींदों को बसा दे आ कर मलिका पुखराज

मैं आरज़ू-ए-जाँ लिखूँ या जान-ए-आरज़ू!

मैं आरज़ू-ए-जाँ लिखूँ या जान-ए-आरज़ू! अज्ञात

मिरी शाम-ए-ग़म को वो बहला रहे हैं

मिरी शाम-ए-ग़म को वो बहला रहे हैं मलिका पुखराज

वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए

वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए अख़्तर शीरानी

वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए

वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए फ़रीदा ख़ानम

वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए

वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए अख़्तर शीरानी

वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए

वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए ग़ुलाम अली

वो कहते हैं रंजिश की बातें भुला दें

वो कहते हैं रंजिश की बातें भुला दें अख़्तर शीरानी

वो कहते हैं रंजिश की बातें भुला दें

वो कहते हैं रंजिश की बातें भुला दें ताहिरा सैयद

वो कहते हैं रंजिश की बातें भुला दें

वो कहते हैं रंजिश की बातें भुला दें मलिका पुखराज

हर एक जल्वा-ए-रंगीं मिरी निगाह में है

हर एक जल्वा-ए-रंगीं मिरी निगाह में है अज्ञात

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  • कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता

    कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता इक़बाल बानो

  • क्या कह गई किसी की नज़र कुछ न पूछिए

    क्या कह गई किसी की नज़र कुछ न पूछिए हबीब वली मोहम्मद

  • निकहत-ए-ज़ुल्फ़ से नींदों को बसा दे आ कर

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  • मैं आरज़ू-ए-जाँ लिखूँ या जान-ए-आरज़ू!

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  • मिरी शाम-ए-ग़म को वो बहला रहे हैं

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  • वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए

    वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए अख़्तर शीरानी

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  • वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए

    वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए अख़्तर शीरानी

  • वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए

    वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए ग़ुलाम अली

  • वो कहते हैं रंजिश की बातें भुला दें

    वो कहते हैं रंजिश की बातें भुला दें अख़्तर शीरानी

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    वो कहते हैं रंजिश की बातें भुला दें ताहिरा सैयद

  • वो कहते हैं रंजिश की बातें भुला दें

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  • हर एक जल्वा-ए-रंगीं मिरी निगाह में है

    हर एक जल्वा-ए-रंगीं मिरी निगाह में है अज्ञात