जमील मज़हरी
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उलझी थी ज़ुल्फ़ उस ने सँवारा सँवर गई
कब तक निबाहें ऐसे ग़लत आदमी से हम
कहो न ये कि मोहब्बत है तीरगी से मुझे
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