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आरज़ू सहारनपुरी

1899 | कोलकाता, भारत

ग़ज़ल 3

 

शेर 4

भूल के कभी फ़ाश कर राज़-ओ-नियाज़-ए-आशिक़ी

वो भी अगर हों सामने आँख उठा के भी देख

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कभी कभी तो इक ऐसा मक़ाम आया है

मैं हुस्न बन के ख़ुद अपनी नज़र से गुज़रा हूँ

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महसूस कर रहा हूँ ख़ुद अपने जमाल को

जितना तिरे क़रीब चला जा रहा हूँ मैं

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ई-पुस्तक 3

Ilham-e-Sehar

 

 

Ilham-e-Sehar

 

1966

Nay-o-Naghma

 

1968

 

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