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फ़राग़ रोहवी

1956 - 2020 | कोलकाता, भारत

ग़ज़ल 18

शेर 17

हमारे तन पे कोई क़ीमती क़बा सही

ग़ज़ल को अपनी मगर ख़ुश-लिबास रखते हैं

इक दिन वो मेरे ऐब गिनाने लगा 'फ़राग़'

जब ख़ुद ही थक गया तो मुझे सोचना पड़ा

ख़ूब निभेगी हम दोनों में मेरे जैसा तू भी है

थोड़ा झूटा मैं भी ठहरा थोड़ा झूटा तू भी है

दिमाग़ अहल-ए-मोहब्बत का साथ देता नहीं

उसे कहो कि वो दिल के कहे में जाए

खुली मुझ पे भी दीवानगी मिरी बरसों

मिरे जुनून की शोहरत तिरे बयाँ से हुई

दोहा 3

कैसे अपने प्यार के सपने हों साकार

तेरे मेरे बीच है मज़हब की दीवार

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भूल गए हर वाक़िआ बस इतना है याद

माल-ओ-ज़र पर थी खड़ी रिश्तों की बुनियाद

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नफ़रत के संसार में खेलें अब ये खेल

इक इक इंसाँ जोड़ के बन जाएँ हम रेल

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पुस्तकें 8

Chhaiyan Chhaiyan

 

1999

Ham Bachche Hain Padhne Wale

 

2012

Hamd Ka Aalmi Intekhab

 

2019

जुनूँ ख़्वाब

 

2013

Zara Intizaar Kar

 

2002

तरकश

शुमारा नम्बर-007

2004

Tarkash

Shumara Number-012

2012

Tarkash

Javed Danish Number : Shumara Number-001

2005

 

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