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नाज़िम सुल्तानपूरी

1927 | कोलकाता, भारत

ग़ज़ल 3

 

शेर 4

बड़े क़लक़ की बात है कि तुम इसे पढ़ सके

हमारी ज़िंदगी तो इक खुली हुई किताब थी

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कितनी वीरान है गली दिल की

दूर तक कोई नक़्श-ए-पा भी नहीं

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इक़तिज़ा वक़्त का जो चाहे करा ले वर्ना

हम थे ग़ैर के एहसान उठाने वाले

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पुस्तकें 1

हर्फ़-ए-आगही

 

1977

 

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