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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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नाज़िम सुल्तानपूरी

1927 | कोलकाता, भारत

नाज़िम सुल्तानपूरी के शेर

अपनी संजीदा तबीअत पे तो अक्सर 'नाज़िम'

फ़िक्र के शोख़ उजाले भी गिराँ होते हैं

बड़े क़लक़ की बात है कि तुम इसे न पढ़ सके

हमारी ज़िंदगी तो इक खुली हुई किताब थी

कितनी वीरान है गली दिल की

दूर तक कोई नक़्श-ए-पा भी नहीं

इक़तिज़ा वक़्त का जो चाहे करा ले वर्ना

हम न थे ग़ैर के एहसान उठाने वाले

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