क़ैसर शमीम

ग़ज़ल 9

अशआर 6

सब्ज़ मौसम से मुझे क्या लेना

शाख़ से अपनी जुदा हूँ बाबा

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किसी मंज़िल में भी हासिल हुआ दिल को क़रार

ज़िंदगी ख़्वाहिश-ए-नाकाम ही करते गुज़री

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मेरा मज़हब इश्क़ का मज़हब जिस में कोई तफ़रीक़ नहीं

मेरे हल्क़े में आते हैं 'तुलसी' भी और 'जामी' भी

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उस के आँगन में रौशनी थी मगर

घर के अंदर बड़ा अँधेरा था

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मौसम अजीब रहता है दल के दयार का

आगे हैं लू के झोंके भी ठंडी हवा के बा'द

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI