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इज्तिबा रिज़वी

1908 - 1991 | छपरा, भारत

इज्तिबा रिज़वी

ग़ज़ल 33

नज़्म 4

 

अशआर 34

अफ़्सुर्दगी भी हुस्न है ताबिंदगी भी हुस्न

हम को ख़िज़ाँ ने तुम को सँवारा बहार ने

हज़ार आरज़ू हो तुम यक़ीं हो तुम गुमाँ हो तुम

क़फ़स-नसीब रूह की उमीद-ए-आशियाँ हो तुम

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आग पानी से भाप उठती रही

हम समझते रहे मोहब्बत है

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इंसान को दिल मिला मगर क्या

अंधे के हाथ में दिया है

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एक दिन रिंदों ने मस्जिद में नमाज़ के पढ़ी

दूसरे दिन उसे मय-ख़ाना बना कर छोड़ा

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पुस्तकें 1

 

ऑडियो 5

इक अख़्गर-ए-जमाल फ़रोज़ाँ ब-शक्ल-ए-दिल

ख़िरद को ख़ाना-ए-दिल का निगह-बाँ कर दिया हम ने

चुराने को चुरा लाया मैं जल्वे रू-ए-रौशन से

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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