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इज्तिबा रिज़वी

1908 - 1991 | छपरा, भारत

ग़ज़ल 21

शेर 6

अफ़्सुर्दगी भी हुस्न है ताबिंदगी भी हुस्न

हम को ख़िज़ाँ ने तुम को सँवारा बहार ने

ज़बाँ से दिल का फ़साना अदा किया गया

ये तर्जुमाँ तो बनी थी मगर बना गया

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ख़िरद को ख़ाना-ए-दिल का निगह-बाँ कर दिया हम ने

ये घर आबाद होता इस को वीराँ कर दिया हम ने

मिरे साज़-ए-नफ़स की ख़ामुशी पर रूह कहती है

आई मुझ को नींद और सो गया अफ़्साना-ख़्वाँ मेरा

चुराने को चुरा लाया मैं जल्वे रू-ए-रौशन से

मगर अब बिजलियाँ लिपटी हुई हैं दिल के दामन से

पुस्तकें 1

Shola-e-Nida

 

1954

 

ऑडियो 5

इक अख़्गर-ए-जमाल फ़रोज़ाँ ब-शक्ल-ए-दिल

ख़िरद को ख़ाना-ए-दिल का निगह-बाँ कर दिया हम ने

चुराने को चुरा लाया मैं जल्वे रू-ए-रौशन से

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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