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अमीर रज़ा मज़हरी

1908 | कोलकाता, भारत

अमीर रज़ा मज़हरी

ग़ज़ल 15

अशआर 7

तुम किसी के भी हो नहीं सकते

तुम को अपना बना के देख लिया

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हम को बचपन ही से इक शौक़ था बर्बादी से

नाम लिख लिख के मिटाते थे ज़मीं पर अपना

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हम बने थे तबाह होने को

आप का इश्क़ तो बहाना था

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हम हैं उन से वो ग़ैर से मायूस

क्या मोहब्बत किसी को रास नहीं

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क्या तअज्जुब है जो यारों ने रिफ़ाक़त छोड़ी

बैठता कौन है गिरती हुई दीवार के पास

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