Gulzar's Photo'

गुलज़ार

1936 | मुंबई, भारत

सम्पूर्ण सिंह/प्रमुख फि़ल्म निर्माता और निर्देशक, फि़ल्म गीतकार और कहानीकार/मिजऱ्ा गालिब पर टीवी सीरियल के लिए प्रसिद्ध/साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त

सम्पूर्ण सिंह/प्रमुख फि़ल्म निर्माता और निर्देशक, फि़ल्म गीतकार और कहानीकार/मिजऱ्ा गालिब पर टीवी सीरियल के लिए प्रसिद्ध/साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त

ग़ज़ल 38

नज़्म 64

शेर 49

आइना देख कर तसल्ली हुई

हम को इस घर में जानता है कोई

शाम से आँख में नमी सी है

आज फिर आप की कमी सी है

ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा

क़ाफ़िला साथ और सफ़र तन्हा

कहानी 2

 

ई-पुस्तक 6

Aandhi

 

2003

Gulzar Nama

 

2018

Pichhle Panne

 

2013

Rawi Par

 

2001

तन्हा चाँद

 

 

चहार-सू

गुलज़ार नंबर: खण्ड-021

2012

 

चित्र शायरी 14

मेरे कपड़ों में टंगा है तेरा ख़ुश-रंग लिबास! घर पे धोता हूँ हर बार उसे और सुखा के फिर से अपने हाथों से उसे इस्त्री करता हूँ मगर इस्त्री करने से जाती नहीं शिकनें उस की और धोने से गिले-शिकवों के चिकते नहीं मिटते! ज़िंदगी किस क़दर आसाँ होती रिश्ते गर होते लिबास और बदल लेते क़मीज़ों की तरह!

हर एक ग़म निचोड़ के हर इक बरस जिए दो दिन की ज़िंदगी में हज़ारों बरस जिए सदियों पे इख़्तियार नहीं था हमारा दोस्त दो चार लम्हे बस में थे दो चार बस जिए सहरा के उस तरफ़ से गए सारे कारवाँ सुन सुन के हम तो सिर्फ़ सदा-ए-जरस जिए होंटों में ले के रात के आँचल का इक सिरा आँखों पे रख के चाँद के होंटों का मस जिए महदूद हैं दुआएँ मिरे इख़्तियार में हर साँस पुर-सुकून हो तू सौ बरस जिए

फूलों की तरह लब खोल कभी ख़ुशबू की ज़बाँ में बोल कभी अल्फ़ाज़ परखता रहता है आवाज़ हमारी तोल कभी अनमोल नहीं लेकिन फिर भी पूछ तो मुफ़्त का मोल कभी खिड़की में कटी हैं सब रातें कुछ चौरस थीं कुछ गोल कभी ये दिल भी दोस्त ज़मीं की तरह हो जाता है डाँवा-डोल कभी

वीडियो 66

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

गुलज़ार

Gulzar - Mushaira - Majlise Auditorium - Poems - By Gulzar

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गुलज़ार

Gulzar Nazm In His Own Voice | 41 Nazm Jukebox Collection written and recited by Gulzar Saab

गुलज़ार

gulzar poetry ,, pyar kabhi ik tarfa hota hai na hoga

गुलज़ार

Poet Gulzar recites his poems

गुलज़ार

Din Kuchh Aise Guzaarta Hai Koi | Gulzar Nazm In His Own Voice

गुलज़ार

अकेले

किस क़दर सीधा, सहल, साफ़ है रस्ता देखो गुलज़ार

अलाव

रात-भर सर्द हवा चलती रही गुलज़ार

आदत

साँस लेना भी कैसी आदत है गुलज़ार

उर्दू ज़बाँ

ये कैसा इश्क़ है उर्दू ज़बाँ का गुलज़ार

ओस पड़ी थी रात बहुत और कोहरा था गर्माइश पर

गुलज़ार

किताबें

किताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों से गुलज़ार

ख़ुद-कुशी

बस इक लम्हे का झगड़ा था गुलज़ार

गिरहें

मुझ को भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे गुलज़ार

बे-ख़ुदी

दो सौंधे सौंधे से जिस्म जिस वक़्त गुलज़ार

बीते रिश्ते तलाश करती है

गुलज़ार

रूह देखी है कभी!

रूह देखी है? गुलज़ार

लिबास

मेरे कपड़ों में टंगा है गुलज़ार

ऑडियो 6

अलाव

ख़ुदा

चम्पई धूप

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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