Kaifi Azmi's Photo'

कैफ़ी आज़मी

1919 - 2002 | मुंबई, भारत

लोकप्रिय प्रमुख प्रगतिशील शायर और फि़ल्म गीतकार/हीर राँझा और काग़ज़ के फूल के गीतों के लिए प्रसिद्ध

लोकप्रिय प्रमुख प्रगतिशील शायर और फि़ल्म गीतकार/हीर राँझा और काग़ज़ के फूल के गीतों के लिए प्रसिद्ध

ग़ज़ल 16

नज़्म 43

शेर 17

बस इक झिजक है यही हाल-ए-दिल सुनाने में

कि तेरा ज़िक्र भी आएगा इस फ़साने में

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इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं

दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद

झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं

दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं

ई-पुस्तक 22

अावारा सजदे

 

1974

अाख़िरे शब

 

1947

Iblees Ki Majlis-e-Shoora

 

1983

झंकार

 

1944

कैफ़ी आज़मी

अक्स और जिहतें

1992

कौफ़ी अाज़मी : फ़िक्र-ओ-फ़न

 

2005

कैफ़ी आज़मी : शख़्सियत शाइरी और अहद

 

2005

कैफ़ी आज़मी कलेक्शन

 

 

कैफ़ी आज़मी के साथ एक शाम

 

1992

Kaifiyaat

Kulliyat-e-Kaifi Azmi

2012

चित्र शायरी 11

बस इक झिजक है यही हाल-ए-दिल सुनाने में कि तेरा ज़िक्र भी आएगा इस फ़साने में

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ बार-हा तोड़ चुका हूँ जिन को उन्हीं दीवारों से टकराता हूँ रोज़ बसते हैं कई शहर नए रोज़ धरती में समा जाते हैं ज़लज़लों में थी ज़रा सी गर्मी वो भी अब रोज़ ही आ जाते हैं जिस्म से रूह तलक रेत ही रेत न कहीं धूप न साया न सराब कितने अरमान हैं किस सहरा में कौन रखता है मज़ारों का हिसाब नब्ज़ बुझती भी भड़कती भी है दिल का मामूल है घबराना भी रात अंधेरे ने अंधेरे से कहा एक आदत है जिए जाना भी क़ौस इक रंग की होती है तुलू एक ही चाल भी पैमाने की गोशे गोशे में खड़ी है मस्जिद शक्ल क्या हो गई मय-ख़ाने की कोई कहता था समुंदर हूँ मैं और मिरी जेब में क़तरा भी नहीं ख़ैरियत अपनी लिखा करता हूँ अब तो तक़दीर में ख़तरा भी नहीं अपने हाथों को पढ़ा करता हूँ कभी क़ुरआँ कभी गीता की तरह चंद रेखाओं में सीमाओं में ज़िंदगी क़ैद है सीता की तरह राम कब लौटेंगे मालूम नहीं काश रावण ही कोई आ जाता

बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमाँ जो बस गए इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए

अपनी नज़र में भी तो वो अपना नहीं रहा चेहरे पे आदमी के है चेहरा चढ़ा हुआ मंज़र था आँख भी थी तमन्ना-ए-दीद भी लेकिन किसी ने दीद पे पहरा बिठा दिया ऐसा करें कि सारा समुंदर उछल पड़े कब तक यूँ सत्ह-ए-आब पे देखेंगे बुलबुला बरसों से इक मकान में रहते हैं साथ साथ लेकिन हमारे बीच ज़मानों का फ़ासला मजमा' था डुगडुगी थी मदारी भी था मगर हैरत है फिर भी कोई तमाशा नहीं हुआ आँखें बुझी बुझी सी हैं बाज़ू थके थके ऐसे में कोई तीर चलाने का फ़ाएदा वो बे-कसी कि आँख खुली थी मिरी मगर ज़ौक़-ए-नज़र पे जब्र ने पहरा बिठा दिया

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ बार-हा तोड़ चुका हूँ जिन को उन्हीं दीवारों से टकराता हूँ रोज़ बसते हैं कई शहर नए रोज़ धरती में समा जाते हैं ज़लज़लों में थी ज़रा सी गर्मी वो भी अब रोज़ ही आ जाते हैं जिस्म से रूह तलक रेत ही रेत न कहीं धूप न साया न सराब कितने अरमान हैं किस सहरा में कौन रखता है मज़ारों का हिसाब नब्ज़ बुझती भी भड़कती भी है दिल का मामूल है घबराना भी रात अंधेरे ने अंधेरे से कहा एक आदत है जिए जाना भी क़ौस इक रंग की होती है तुलू एक ही चाल भी पैमाने की गोशे गोशे में खड़ी है मस्जिद शक्ल क्या हो गई मय-ख़ाने की कोई कहता था समुंदर हूँ मैं और मिरी जेब में क़तरा भी नहीं ख़ैरियत अपनी लिखा करता हूँ अब तो तक़दीर में ख़तरा भी नहीं अपने हाथों को पढ़ा करता हूँ कभी क़ुरआँ कभी गीता की तरह चंद रेखाओं में सीमाओं में ज़िंदगी क़ैद है सीता की तरह राम कब लौटेंगे मालूम नहीं काश रावण ही कोई आ जाता

बस इक झिजक है यही हाल-ए-दिल सुनाने में कि तेरा ज़िक्र भी आएगा इस फ़साने में

वीडियो 48

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
Kaifi Azmi at a mushaira

कैफ़ी आज़मी

Nazm-Aazadi

कैफ़ी आज़मी

Tribute to Guru Dutt by Kaifi Azmi

कैफ़ी आज़मी

Zikr-e-Haq itna mukhasar bhi nahi - Kaifi Azmi

कैफ़ी आज़मी

ख़ार-ओ-ख़स तो उठें रास्ता तो चले

कैफ़ी आज़मी

आदत

मुद्दतों मैं इक अंधे कुएँ में असीर कैफ़ी आज़मी

औरत

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे कैफ़ी आज़मी

ज़िंदगी

आज अँधेरा मिरी नस नस में उतर जाएगा कैफ़ी आज़मी

दूसरा बन-बास

राम बन-बास से जब लौट के घर में आए कैफ़ी आज़मी

मकान

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है कैफ़ी आज़मी

वो भी सराहने लगे अर्बाब-ए-फ़न के बा'द

कैफ़ी आज़मी

वो भी सराहने लगे अर्बाब-ए-फ़न के बा'द

कैफ़ी आज़मी

सुना करो मिरी जाँ इन से उन से अफ़्साने

कैफ़ी आज़मी

ऑडियो 29

ख़ार-ओ-ख़स तो उठें रास्ता तो चले

लाई फिर एक लग़्ज़िश-ए-मस्ताना तेरे शहर में

क्या जाने किस की प्यास बुझाने किधर गईं

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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