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जावेद अख़्तर

1945 | मुंबई, भारत

फ़िल्म स्क्रिप्ट- राइटर , गीतकार और शायर। ' शोले ' और ' दीवार ' जैसी फ़िल्मों के लिए प्रसिद्ध

फ़िल्म स्क्रिप्ट- राइटर , गीतकार और शायर। ' शोले ' और ' दीवार ' जैसी फ़िल्मों के लिए प्रसिद्ध

जावेद अख़्तर

ग़ज़ल 52

शेर 47

कभी जो ख़्वाब था वो पा लिया है

मगर जो खो गई वो चीज़ क्या थी

जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता

मुझे पामाल रस्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता

डर हम को भी लगता है रस्ते के सन्नाटे से

लेकिन एक सफ़र पर दिल अब जाना तो होगा

ऊँची इमारतों से मकाँ मेरा घिर गया

कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए

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मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है

किसी का भी हो सर क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता

क़ितआ 4

 

पुस्तकें 14

Lava

 

2011

Tarkash

 

2008

Shumara Number-000

2012

Shumaara Number-065, 66

 

Shumara Number-031,32

1998

Shumara Number-035,036

1998

Shumara Number-037,038

1998

Shumara Number-043,044

1999

Shumara Number-047,048

1999

Shumara Number-055,056

2000

चित्र शायरी 4

ये जीवन इक राह नहीं इक दोराहा है पहला रस्ता बहुत सहल है इस में कोई मोड़ नहीं है ये रस्ता इस दुनिया से बेजोड़ नहीं है इस रस्ते पर मिलते हैं रेतों के आँगन इस रस्ते पर मिलते हैं रिश्तों के बंधन इस रस्ते पर चलने वाले कहने को सब सुख पाते हैं लेकिन टुकड़े टुकड़े हो कर सब रिश्तों में बट जाते हैं अपने पल्ले कुछ नहीं बचता बचती है बे-नाम सी उलझन बचता है साँसों का ईंधन जिस में उन की अपनी हर पहचान और उन के सारे सपने जल बुझते हैं इस रस्ते पर चलने वाले ख़ुद को खो कर जग पाते हैं ऊपर ऊपर तो जीते हैं अंदर अंदर मर जाते हैं दूसरा रस्ता बहुत कठिन है इस रस्ते में कोई किसी के साथ नहीं है कोई सहारा देने वाला नहीं है इस रस्ते में धूप है कोई छाँव नहीं है जहाँ तसल्ली भीक में दे दे कोई किसी को इस रस्ते में ऐसा कोई गाँव नहीं है ये उन लोगों का रस्ता है जो ख़ुद अपने तक जाते हैं अपने आप को जो पाते हैं तुम इस रस्ते पर ही चलना मुझे पता है ये रस्ता आसान नहीं है लेकिन मुझ को ये ग़म भी है तुम को अब तक क्यूँ अपनी पहचान नहीं है

 

वीडियो 48

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

जावेद अख़्तर

At a mushaira

जावेद अख़्तर

Fasaad ke baad - a nazm

जावेद अख़्तर

Hamare shauq ki ye inteha thi

जावेद अख़्तर

Javed Akhtar Explains the Ghazal

जावेद अख़्तर

Kabir ke dohon se, Mir ki shayari tak

जावेद अख़्तर

Kal Jahaan deewar thi hai aaj ek dar dekhiye

जावेद अख़्तर

kal jahaan diivaar thi hai aaj

जावेद अख़्तर

Reciting own poetry

जावेद अख़्तर

kal jahaan diivaar thi hai aaj

जावेद अख़्तर

आँसू

किसी का ग़म सुन के जावेद अख़्तर

कल जहाँ दीवार थी है आज इक दर देखिए

जावेद अख़्तर

कल जहाँ दीवार थी है आज इक दर देखिए

जावेद अख़्तर

ज़रा मौसम तो बदला है मगर पेड़ों की शाख़ों पर नए पत्तों के आने में अभी कुछ दिन लगेंगे

जावेद अख़्तर

जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता

जावेद अख़्तर

जीना मुश्किल है कि आसान ज़रा देख तो लो

जावेद अख़्तर

निगल गए सब की सब समुंदर ज़मीं बची अब कहीं नहीं है

जावेद अख़्तर

बंजारा

मैं बंजारा जावेद अख़्तर

भूक

आँख खुल गई मेरी जावेद अख़्तर

शबाना

ये आए दिन के हंगामे जावेद अख़्तर

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