Ali Sardar Jafri's Photo'

अली सरदार जाफ़री

1913 - 2000 | मुंबई, भारत

अग्रणी प्रगतिशील शायरों में शामिल/आलोचक, बुद्धिजीवी और साहित्यिक पत्रिका ‘गुफ़्तुगू’ के संपादक/भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित/उर्दू शायरों पर टीवी सीरियलों के निर्माता

अग्रणी प्रगतिशील शायरों में शामिल/आलोचक, बुद्धिजीवी और साहित्यिक पत्रिका ‘गुफ़्तुगू’ के संपादक/भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित/उर्दू शायरों पर टीवी सीरियलों के निर्माता

ग़ज़ल 46

नज़्म 39

शेर 20

दामन झटक के वादी-ए-ग़म से गुज़र गया

उठ उठ के देखती रही गर्द-ए-सफ़र मुझे

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इंक़लाब आएगा रफ़्तार से मायूस हो

बहुत आहिस्ता नहीं है जो बहुत तेज़ नहीं

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काम अब कोई आएगा बस इक दिल के सिवा

रास्ते बंद हैं सब कूचा-ए-क़ातिल के सिवा

क़ितआ 58

ई-पुस्तक 70

1951 Ka Behtareen Adab

 

 

अली सरदार जाफ़री

शख़्सियत और अदबी ख़िदमात

1993

Ali Sardar Jafari

 

2007

अली सरदार जाफ़री नम्बर

 

2011

अली सरदार जाफ़री : शख़्स शायर और अदीब

 

2002

Ali Sardar Jafri : Ek Mutala

 

2001

Ali Sardar Jafri: Hayat Aur Takhliqi Jihat

 

2016

अली सरदार जाफ़री: शख़्सियत और फ़न

 

1994

Ali Sardar Jafri:Apni Bahnon Ki Nazar Mein

 

1990

अम्न का सितारा

 

1950

चित्र शायरी 4

ज़ुल्म की कुछ मीआ'द नहीं है दाद नहीं फ़रियाद नहीं है क़त्ल हुए हैं अब तक कितने कू-ए-सितम को याद नहीं है आख़िर रोएँ किस को किस को कौन है जो बर्बाद नहीं है क़ैद चमन भी बन जाता है मुर्ग़-ए-चमन आज़ाद नहीं है लुत्फ़ ही क्या गर अपने मुक़ाबिल सतवत-ए-बर्क़-ओ-बाद नहीं है सब हों शादाँ सब हों ख़ंदाँ तन्हा कोई शाद नहीं है दावत-ए-रंग-ओ-निकहत है ये ख़ंदा-ए-गुल बर्बाद नहीं है

 

वीडियो 14

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
"Karbala" by Ali Sardar Jafri

अली सरदार जाफ़री

"Sarhad" nazm by Ali Sardar Jafri

अली सरदार जाफ़री

kabhi khandan kabhi giryan chaliye

अली सरदार जाफ़री

Sardar Jafri Jasn e Faiz

अली सरदार जाफ़री

Sardar Jafri recites -Shikast

अली सरदार जाफ़री

shikasht-e-shauq ko

अली सरदार जाफ़री

तीन शराबी

ज़िक्र नहीं ये फ़र्ज़ानों का अली सरदार जाफ़री

निवाला

माँ है रेशम के कार-ख़ाने में अली सरदार जाफ़री

मेरा सफ़र

''हम-चू सब्ज़ा बार-हा रोईदा-एम'' अली सरदार जाफ़री

शिकस्त-ए-शौक़ को तकमील-ए-आरज़ू कहिए

अली सरदार जाफ़री

हर्फ़-ए-आख़िर

ये आदमी की गुज़रगाह-ए-शाहराह-ए-हयात अली सरदार जाफ़री

ऑडियो 14

अक़ीदे बुझ रहे हैं शम-ए-जाँ ग़ुल होती जाती है

काम अब कोई न आएगा बस इक दिल के सिवा

शिकस्त-ए-शौक़ को तकमील-ए-आरज़ू कहिए

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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