Majrooh Sultanpuri's Photo'

मजरूह सुल्तानपुरी

1915 - 2000 | मुंबई, भारत

भारत के सबसे प्रमुख प्रगतिशील गजल-शायर/प्रमुख फि़ल्म गीतकार/दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित

भारत के सबसे प्रमुख प्रगतिशील गजल-शायर/प्रमुख फि़ल्म गीतकार/दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित

ग़ज़ल 42

शेर 43

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर

लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया

देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार

रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर देख

शब-ए-इंतिज़ार की कश्मकश में पूछ कैसे सहर हुई

कभी इक चराग़ जला दिया कभी इक चराग़ बुझा दिया

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गीत 6

ई-पुस्तक 14

Ghazal

 

1970

Ghazal

 

1959

ग़ज़ल

 

1982

Kulliyat-e-Majruh Sultanpuri

 

2003

मजरूह

गुलकारी-ए-वहशत का शायर

2000

Majrooh Fehmi

 

 

मजरूह सुल्तानपूरी

मुक़ाम और कलाम

2008

Majrooh Sultanpuri: Ek Mutalea

 

1999

मशअल-ए-जाँ

 

1991

Mashal-e-Jaan

 

1999

चित्र शायरी 13

शब-ए-इंतिज़ार की कश्मकश में न पूछ कैसे सहर हुई कभी इक चराग़ जला दिया कभी इक चराग़ बुझा दिया

शब-ए-इंतिज़ार की कश्मकश में न पूछ कैसे सहर हुई कभी इक चराग़ जला दिया कभी इक चराग़ बुझा दिया

हम हैं राही प्यार के हम से कुछ न बोलिए जो भी प्यार से मिला हम उसी के हो लिए हम हैं राही प्यार के हम से कुछ न बोलिए दर्द भी हमें क़ुबूल चैन भी हमें क़ुबूल हम ने हर तरह के फूल हार में पिरो लिए जो भी प्यार से मिला हम उसी के हो लिए धूप थी नसीब में धूप में लिया है दम चाँदनी मिली तो हम चाँदनी में सो लिए जो भी प्यार से मिला हम उसी के हो लिए दिल का आसरा लिए हम तो बस यूँही जिए इक क़दम पे हँस लिए इक क़दम पे रो लिए जो भी प्यार से मिला हम उसी के हो लिए राह में पड़े हैं हम कब से आप की क़सम देखिए तो कम से कम बोलिए न बोलिए जो भी प्यार से मिला हम उसी के हो लिए

जफ़ा के ज़िक्र पे तुम क्यूँ सँभल के बैठ गए तुम्हारी बात नहीं बात है ज़माने की

वीडियो 18

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
Mana shab-e-gham subh ki mehram to nahin hai

मजरूह सुल्तानपुरी

गो रात मिरी सुब्ह की महरम तो नहीं है

मजरूह सुल्तानपुरी

जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम-ए-जाँ बनता गया

मजरूह सुल्तानपुरी

जला के मिशअल-ए-जाँ हम जुनूँ-सिफ़ात चले

मजरूह सुल्तानपुरी

जला के मिशअल-ए-जाँ हम जुनूँ-सिफ़ात चले

मजरूह सुल्तानपुरी

ब-नाम-ए-कूचा-ए-दिलदार गुल बरसे कि संग आए

मजरूह सुल्तानपुरी

ब-नाम-ए-कूचा-ए-दिलदार गुल बरसे कि संग आए

मजरूह सुल्तानपुरी

मुझ से कहा जिब्रील-ए-जुनूँ ने ये भी वही-ए-इलाही है

मजरूह सुल्तानपुरी

हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो हम थे परेशाँ तुम से ज़ियादा

मजरूह सुल्तानपुरी

हमें शुऊर-ए-जुनूँ है कि जिस चमन में रहे

मजरूह सुल्तानपुरी

हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह

मजरूह सुल्तानपुरी

ऑडियो 52

अब अहल-ए-दर्द ये जीने का एहतिमाम करें

अहल-ए-तूफ़ाँ आओ दिल-वालों का अफ़्साना कहें

आ निकल के मैदाँ में दो-रुख़ी के ख़ाने से

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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