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कृष्ण बिहारी नूर

1926 - 2003 | लखनऊ, भारत

लोकप्रिय शायर, लखनवी भाषा-संस्कृति के नुमाइंदे।

लोकप्रिय शायर, लखनवी भाषा-संस्कृति के नुमाइंदे।

ग़ज़ल 30

शेर 13

तिश्नगी के भी मक़ामात हैं क्या क्या यानी

कभी दरिया नहीं काफ़ी कभी क़तरा है बहुत

यही मिलने का समय भी है बिछड़ने का भी

मुझ को लगता है बहुत अपने से डर शाम के बाद

क्यूँ आईना कहें उसे पत्थर क्यूँ कहें

जिस आईने में अक्स उस का दिखाई दे

ई-पुस्तक 3

Dhoop Dhoop

 

1979

दुख़ सुख़

 

1977

Tapasya

 

1992

 

वीडियो 7

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
Nazar mila na sake us se us nigaah ke baad

कृष्ण बिहारी नूर

Reading his poetry at a mushaira

कृष्ण बिहारी नूर

Wo kya hai, kaun hai, kaise koi nazar jaane

कृष्ण बिहारी नूर

इक ग़ज़ल उस पे लिखूँ दिल का तक़ाज़ा है बहुत

कृष्ण बिहारी नूर

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