noImage

वलीउल्लाह मुहिब

- 1792 | लखनऊ, भारत

ग़ज़ल 48

शेर 67

है मिरे पहलू में और मुझ को नज़र आता नहीं

उस परी का सेहर यारो कुछ कहा जाता नहीं

  • शेयर कीजिए

साक़ी हमें क़सम है तिरी चश्म-ए-मस्त की

तुझ बिन जो ख़्वाब में भी पिएँ मय हराम हो

  • शेयर कीजिए

दोनों तेरी जुस्तुजू में फिरते हैं दर दर तबाह

दैर हिन्दू छोड़ कर काबा मुसलमाँ छोड़ कर

  • शेयर कीजिए

कीजे वो कि मियाँ जिस से दिल कोई हो मलूल

सिवाए इस के जो जी चाहे सो किया कीजे

  • शेयर कीजिए

दैर में का'बे में मयख़ाने में और मस्जिद में

जल्वा-गर सब में मिरा यार है अल्लाह अल्लाह

  • शेयर कीजिए

पुस्तकें 1

Deewan-e-Waleeullah Muhib

 

1999

 

संबंधित शायर

  • मीर तक़ी मीर मीर तक़ी मीर समकालीन
  • मोहम्मद रफ़ी सौदा मोहम्मद रफ़ी सौदा समकालीन

"लखनऊ" के और शायर

  • मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
  • हैदर अली आतिश हैदर अली आतिश
  • इमदाद अली बहर इमदाद अली बहर
  • अज़ीज़ बानो दाराब  वफ़ा अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
  • इरफ़ान सिद्दीक़ी इरफ़ान सिद्दीक़ी
  • असरार-उल-हक़ मजाज़ असरार-उल-हक़ मजाज़
  • वज़ीर अली सबा लखनवी वज़ीर अली सबा लखनवी
  • सिराज लखनवी सिराज लखनवी
  • अरशद अली ख़ान क़लक़ अरशद अली ख़ान क़लक़
  • रिन्द लखनवी रिन्द लखनवी