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वलीउल्लाह मुहिब

- 1792 | लखनऊ, भारत

ग़ज़ल 48

शेर 67

है मिरे पहलू में और मुझ को नज़र आता नहीं

उस परी का सेहर यारो कुछ कहा जाता नहीं

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साक़ी हमें क़सम है तिरी चश्म-ए-मस्त की

तुझ बिन जो ख़्वाब में भी पिएँ मय हराम हो

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दोनों तेरी जुस्तुजू में फिरते हैं दर दर तबाह

दैर हिन्दू छोड़ कर काबा मुसलमाँ छोड़ कर

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पुस्तकें 1

Deewan-e-Waleeullah Muhib

 

1999

 

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