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वलीउल्लाह मुहिब

- 1792 | लखनऊ, भारत

ग़ज़ल 48

शेर 65

दैर में का'बे में मयख़ाने में और मस्जिद में

जल्वा-गर सब में मिरा यार है अल्लाह अल्लाह

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दोस्ती छूटे छुड़ाए से किसू के किस तरह

बंद होता ही नहीं रस्ता दिलों की राह का

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ख़त का ये जवाब आया कि क़ासिद गया जी से

सर एक तरफ़ लोटे है और एक तरफ़ धड़

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पुस्तकें 1

Deewan-e-Waleeullah Muhib

 

1999

 

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