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मीर हसन

1717 - 1786 | लखनऊ, भारत

प्रमुख मर्सिया-निगार। मसनवी ‘सहर-उल-बयान’ के लिए विख्यात

प्रमुख मर्सिया-निगार। मसनवी ‘सहर-उल-बयान’ के लिए विख्यात

मीर हसन

ग़ज़ल 95

शेर 106

सदा ऐश दौराँ दिखाता नहीं

गया वक़्त फिर हाथ आता नहीं

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दोस्ती किस से थी किस से मुझे प्यार था

जब बुरे वक़्त पे देखा तो कोई यार था

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और कुछ तोहफ़ा था जो लाते हम तेरे नियाज़

एक दो आँसू थे आँखों में सो भर लाएँ हैं हम

आश्ना बेवफ़ा नहीं होता

बेवफ़ा आश्ना नहीं होता

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जो कोई आवे है नज़दीक ही बैठे है तिरे

हम कहाँ तक तिरे पहलू से सरकते जावें

रुबाई 4

 

मसनवी 1

 

पुस्तकें 62

Deewan-e-Meer Hasan

 

1912

दीवान-ए-मीर हसन

 

1912

Intikhab-e-Kalam-e-Meer Hasan

 

2000

Masnavi Sehr-ul-Bayan

Naya Aks Naya Aaina

1986

Masnaviyat-e-Hasan

Volume-001

1966

Masnaviyat-e-Meer Hasan

Sahr-ul-Bayan, Gulzar-e-Iram, Rumooz-ul-Aarifeen

1944

Masnawi Meer Hasan

सहर-उल-बयान

 

Masnawi Meer Hasan

 

1919

मसनवी सहर-उल-बयान

 

1963

मसनवी सहर-उल-बयान

 

1990

चित्र शायरी 5

दोस्ती किस से न थी किस से मुझे प्यार न था जब बुरे वक़्त पे देखा तो कोई यार न था

सदा ऐश दौराँ दिखाता नहीं गया वक़्त फिर हाथ आता नहीं

दिलबर से हम अपने जब मिलेंगे इस गुम-शुदा दिल से तब मिलेंगे ये किस को ख़बर है अब के बिछड़े क्या जानिए उस से कब मिलेंगे जान-ओ-दिल-ओ-होश-ओ-सब्र-ओ-ताक़त इक मिलने से उस के सब मिलेंगे दुनिया है सँभल के दिल लगाना याँ लोग अजब अजब मिलेंगे ज़ाहिर में तो ढब नहीं है कोई हम यार से किस सबब मिलेंगे होगा कभी वो भी दौर जो हम दिलदार से रोज़-ओ-शब मिलेंगे आराम 'हसन' तभी तो होगा उस लब से जब अपने लब मिलेंगे

है ध्यान जो अपना कहीं ऐ माह-जबीं और जाना है कहीं और तो जाता हूँ कहीं और जब तू ही करे दुश्मनी हम से तो ग़ज़ब है तेरे तो सिवा अपना कोई दोस्त नहीं और मैं हश्र को क्या रोऊँ कि उठ जाते ही तेरे बरपा हुई इक मुझ पे क़यामत तो यहीं और व'अदा तो तिरे आने का है सच ही व-लेकिन बाज़ू के फड़कने से हुआ दिल को यक़ीं और आख़िर तू कहाँ कूचा तिरा और कहाँ हम कर लेवें यहाँ बैठ के इक आह-ए-हज़ीं और था रू-ए-ज़मीं तंग ज़ि-बस हम ने निकाली रहने के लिए शेर के आलम में ज़मीं और नाम अपना लिखावे तो लिखा दिल पे तू मेरे इस नाम को बेहतर नहीं इस से तो नगीं और अबरू की तो थी चीन मिरे दिल पे ग़ज़ब पर मिज़्गाँ से नुमूदार हुए ख़ंजर-ए-कीं और निकले तो उसी कूचा से ये गुम-शुदा निकले ढूँढे है 'हसन' दिल को तो फिर ढूँड वहीं और

 

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