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ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर

1795 - 1854 | लखनऊ, भारत

19 वीं सदी के शायर

19 वीं सदी के शायर

ग़ज़ल 31

शेर 65

देखना हसरत-ए-दीदार इसे कहते हैं

फिर गया मुँह तिरी जानिब दम-ए-मुर्दन अपना

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है साया चाँदनी और चाँद मुखड़ा

दुपट्टा आसमान-ए-आसमाँ है

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जिस को आते देखता हूँ परी कहता हूँ मैं

आदमी भेजा हो मेरे बुलाने के लिए

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आया है मिरे दिल का ग़ुबार आँसुओं के साथ

लो अब तो हुई मालिक-ए-ख़ुश्की-ओ-तरी आँख

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जब ख़फ़ा होता है तो यूँ दिल को समझाता हूँ मैं

आज है ना-मेहरबाँ कल मेहरबाँ हो जाएगा

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पुस्तकें 4

Daftar-e-Fasahat

 

1847

Intikhab Khvaja Wazir

 

1983

Mazhar-e-Ishq

 

1911

Mazhar-e-Ishq

 

1896

 

चित्र शायरी 1

जब ख़फ़ा होता है तो यूँ दिल को समझाता हूँ मैं आज है ना-मेहरबाँ कल मेहरबाँ हो जाएगा

 

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