आशिक़-ए-ज़ुल्फ़-ओ-रुख़-ए-दिलदार आँखें हो गईं

ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर

आशिक़-ए-ज़ुल्फ़-ओ-रुख़-ए-दिलदार आँखें हो गईं

ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर

MORE BYख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर

    आशिक़-ए-ज़ुल्फ़-ओ-रुख़-ए-दिलदार आँखें हो गईं

    मुब्तला-ए-काफ़िर-ओ-दींदार आँखें हो गईं

    सुर्ख़ पलकें हो गईं ख़ूँ-बार आँखें हो गईं

    देख लो अब ज़ख़्म-ए-दामन-दार आँखें हो गईं

    देख कर महव-ए-जमाल-ए-यार आँखें हो गईं

    जाम-हा-ए-शर्बत-ए-दीदार आँखें हो गईं

    आइयो अश्क अब बहने लगा है ख़ून-ए-गरम

    भेजियो पानी कि आतिश-बार आँखें हो गईं

    लड़ गईं तुम से जो आँखें हो गई इक बार सुल्ह

    कीजिए दो-तीन बातें चार आँखें हो गईं

    कश्ती-ए-मय ले के साक़ी पहुँच बहर-ए-ख़ुदा

    बे तिरे महफ़िल में दरिया-बार आँखें हो गईं

    है तसव्वुर बस-कि आँखों में ख़त-ए-रुख़्सार का

    आइने की तरह जौहर-दार आँखें हो गईं

    बुत-ए-काफ़िर है बस बे-ऐब ज़ात अल्लाह की

    लब तिरे ईसा हुए बीमार आँखें हो गईं

    बह गईं पलकें ब-रंग-ए-ख़स मिरी अश्कों के साथ

    अब तो नज़रों में गुल-ए-बे-ख़ार आँखें हो गईं

    चशम-ए-बद्दूर इन को गर्दिश है अजब अंदाज़ से

    परी आहू-ए-ख़ुश-रफ़तार आँखें हो गईं

    मेरे पाँव की तरह हैहात अब गर्दिश में हैं

    किस की ये वारफ़्ता-ए-रफ़्तार आँखें हो गईं

    ऐन नादानी है अब उन से जो रखिए चश्म-दाश्त

    शक्ल-ए-मिज़्गाँ फिर गईं बेज़ार आँखें हो गईं

    लख़्त-ए-दिल याक़ूत में आँसू हैं मोती आब-दार

    आओ देखो जौहरी बाज़ार आँखें हो गईं

    दो तो हैं चश्म-ए-सुख़न-गो गर नहीं है इक दहन

    चुप रहिए क़ाबिल-ए-गुफ़्तार आँखें हो गईं

    इश्क़-ए-पिन्हाँ दीदा-ए-गिर्यां ने ज़ाहिर कर दिया

    हँसने की जा है लब-ए-इज़हार आँखें हो गईं

    अबलक़-ए-चश्म-ए-सनम किस नाज़ से गर्दिश में है

    ख़ूब कावे होते हैं रहवार आँखें हो गईं

    हर किसी ने आँख जब डाली गुलू-ए-साफ़ पर

    हँस के फ़रमाया गले का हार आँखें हो गईं

    तोल लेते हैं सदा नज़रों में जिंस-ए-हुस्न को

    पल्ला-ए-मीज़ाँ मिरी यार आँखें हो गईं

    है तसव्वुर रोज़-ओ-शब किस की तिलाई रंग का

    चश्म-ए-नर्गिस की तरह ज़रदार आँखें हो गईं

    कहते हो सब देखते हैं तेरी आँखों से मुझे

    सच कहो अग़्यार की बेकार आँखें हो गईं

    चलिए अब सहरा से कू-ए-यार उन्हें दिखलाइए

    आबलों से पाँव में दो-चार आँखें हो गईं

    फूल नर्गिस के बनाए कब वहाँ मे'मार ने

    ये हमारी नक़्श-बर-दीवार आँखें हो गईं

    ख़ुदा शाहिद हमारा सुम्मा-वज्हुल्लाह है

    जब निगह की बुत पे तुझ से चार आँखें हो गईं

    आप सा इन को बनाया इश्क़-ए-तीर-ए-यार ने

    है सिरी तार-ए-निगह सूफ़ार आँखें हो गईं

    पेश-ए-नर्गिस हाथ फैलाए हैं शाख़ों से दरख़्त

    किस को देखेंगे जो अब दरकार आँखें हो गईं

    चुप खड़े हैं बन गए हैं नक़्श-बर-दीवार हम

    आओ देखो रौज़न-ए-दीवार आँखें हो गईं

    साक़ी-ओ-मीना-ओ-साग़र एक आते हैं नज़र

    बादा-ए-वहदत से क्या सरशार आँखें हो गईं

    रोते रोते हिज्र में सूजे हैं ये चश्मान-ए-तर

    जिस्म लाग़र हो गया तय्यार आँखें हो गईं

    आशिक़-ए-अब्रू हूँ करना दीदा-ओ-दानिस्ता क़त्ल

    जौहरों से तुझ में तलवार आँखें हो गईं

    आँख के डोरों ने तेरे कुछ तो हैं धागे दिए

    सनम जो माइल-ए-ज़ुन्नार आँखें हो गईं

    फिर गया वो के अब जागे तो क्या हासिल 'वज़ीर'

    सो गए जब बख़्त तब बेदार आँखें हो गईं

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