सर्दी है कि इस जिस्म से फिर भी नहीं जाती

सूरज है कि मुद्दत से मिरे सर पर खड़ा है

अब तक तिरे होंटों पे तबस्सुम का गुमाँ है

हम को तो है महबूब यही आध-खिला फूल