हनीफ़ नज्मी के शेर
जवाज़ कुछ नहीं होता हमारी ख़ुशियों का
उदास रहने का कोई सबब नहीं होता
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वो इक जगह न कहीं रह सका और उस के साथ
किराया-दार थे हम भी मकाँ बदलते रहे
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हर शय को ज़मीं अपनी तरफ़ खींच रही है
कब आता है धरती पे गगन देखते रहना
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अगर जहाँ में कोई आइना नहीं तेरा
तो फिर तुझी को तिरे रू-ब-रू करूँगा मैं
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शा'इरी क्या है मिरी जाँ तुझे मा'लूम नहीं
एक तोहमत है जो मुझ पर भी लगा दी गई है
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वो ख़फ़ा हैं तो रहें हम को मनाना भी नहीं
उन को आना भी नहीं हम को बुलाना भी नहीं
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तिरी तलाश में निकला जो बू-ए-गुल की तरह
पलट के फिर वो कभी अपने घर नहीं जाता
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बंद हों आँखें तो दुनिया साफ़ आती है नज़र
हम यूँही आँखों पे पर्दा तो न थे डाले हुए
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मिरी नज़र में कोई शय नहीं ठहरती है
तुम्हारा हुस्न मगर जम रहा है आँखों में
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बस में जो कुछ था वो मैं ने कर दिया
अब वो 'इज़्ज़त दे कि ज़िल्लत दे मुझे
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तिरे जमाल की देखी जो सादगी हम ने
बना लिया उसे उसलूब-ए-शा’इरी हम ने
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'अजब क़ातिल हो तुम थकते नहीं हो क़त्ल करने से
कभी ख़ंजर तुम्हारा ख़ून से बे-दम नहीं होता
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भला वो ख़ाक समझेंगे ख़ुदा क्या है ख़ुदी क्या है
जो अब तक ये नहीं समझे मक़ाम-ए-आदमी क्या है
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बिसात-ए-ख़ाक पर बेहद क़द-आवर लग रहे थे जो
बुलंदी पर पहुँच कर वो बहुत छोटे नज़र आए
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जब से घर वाले ज़ियादा हम को समझाने लगे
भूल बैठे थे जिन्हें हम वो भी याद आने लगे
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कमी कुछ अपने ही ज़ौक़-ए-तलब में है वर्ना
दु'आ का हर्फ़ कभी बे-असर नहीं जाता
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मिली न हम को शहादत तो क्या ये क्या कम है
कि सारी 'उम्र रह-ए-कर्बला पे चलते रहे
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है दीदा-वर तो एक नज़र में परख मुझे
लाज़िम नहीं किसी को कई बार देखना
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ज़माने से मैं ना-क़द्री का शिकवा क्या करूँ 'नजमी'
ख़ुद अपनी ही नज़र से 'उम्र भर ओझल रहा हूँ मैं
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इस शहर में किसी को मयस्सर न था सुकूँ
रोना किसी को दिल का किसी को अना का था
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तिरे ग़म ने 'अता की है 'अजब पाकीज़गी मुझ को
मैं रोता हूँ तो आँखों से मिरी ज़मज़म निकलता है
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तू पुराने-पन पे मेरे इतना अफ़्सुर्दा न हो
आने वाले कल को मैं फिर से नया हो जाऊँगा
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मिरे मौला ये कैसा वसवसा आया मिरे दिल में
अब उस के सामने जाते हुए भी डर रहा हूँ मैं
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आग ऐसी है कुछ उस में कि बुझाना है मुहाल
बर्फ़ ऐसी है कि पिघला नहीं सकता कोई
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उस में जो कुछ है 'अलावा हुस्न के
छाँट देता है मिरा तार-ए-नज़र
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मिरे पैकर में लाखों सूरजों की आग पिन्हाँ है
ग़रीक़-ए-आब हूँ फिर भी मुसलसल जल रहा हूँ मैं
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बज़्म में आते ही उस के बुझ गईं आँखें तमाम
सब के सब दीदार की हसरत लिए बैठे रहे
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मिरे क़बीले का हर शख़्स मुझ से बद-ज़न है
मिरी ख़ता है बस इतनी कि सोचता हूँ मैं
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जब पहली बार गाँव से वो शहर को गया
हैरत से ऊँचे ऊँचे भवन देखता रहा
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'इश्क़ में जल जल के कुंदन बन गया हूँ सर-बसर
अब भी क्या मेरा ख़ुदा दोज़ख़ में डालेगा मुझे
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ये अलग बात कि साया है सलामत उस का
वर्ना दीवार तो चाहत की गिरा दी गई है
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उलझना लफ़्ज़ों से शेवा है कम-निगाहों का
जो दीदा-वर हैं वो बैनस्सुतूर देखते हैं
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तब्सिरा करते रहे हम ज़ुल्मतों पर
खो गया सारा असासा रौशनी में
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शिकस्त कर न सका कोई ग़ज़नवी उस को
वो एक बुत जो मिरे दिल के सोमनात में है
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नशा वुजूद का जब तक उतर नहीं जाता
दिलों से खोट निगाहों से शर नहीं जाता
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ये वस्ल की ख़्वाहिश भी मियाँ बुल-हवसी है
जिस दिल में मोहब्बत हो तमन्ना नहीं होती
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नुक़्ता न था लकीर न था दायरा न था
वो हर्फ़ था मैं जिस को किसी ने लिखा न था
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तू मेरे हक़ में कोई फ़ैसला अभी से न कर
कि लम्हा लम्हा मैं ख़ुद को नया बनाता हूँ
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सूरज को जाने किस के तक़द्दुस का है ख़याल
मग़रिब की सम्त जब भी गया सर के बल गया
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किसी का वस्ल तो जन्नत का ख़्वान है 'नजमी'
ये मन्न-व-सल्वा हमेशा नहीं उतरता है
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हर हाल में ख़ुश रहना हर रोज़ ग़ज़ल कहना
हम ने यही जीने की इक राह निकाली है
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रखता था वो भी मेरी रविश पर कड़ी निगाह
और मैं भी उस का चाल-चलन देखता रहा
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मैं सादा-लौह करता भी क्या तेरे शहर में
चुप-चाप यार लोगों का फ़न देखता रहा
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कीजिए क्या उन से अख़्लाक़-ओ-मुरव्वत की उमीद
ये हैं सब के सब नई तहज़ीब के पाले हुए
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खिल उट्ठा मेरे दिल का चमन भी पस-ए-विसाल
ख़ित्ते तिरे बदन के भी शादाब हो गए
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है धूप भी इस के लिए थोड़ी सी ज़रूरी
ये नख़्ल घनी छाँव में मुरझाने लगा है
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काफ़ूर हुई जब से मिरे दिल की स्याही
हर चेहरा मुझे साफ़ नज़र आने लगा है
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गुलशन में ये बहार रुकी ही रहेगी क्या
ये चाँदनी बदन की खिली ही रहेगी क्या
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सफ़र हो ख़त्म तो शायद ये फ़ासला मिट जाए
अभी तो मैं हूँ ज़मीं पर वो आसमान पे है
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