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हनीफ़ नज्मी

1959 | छत्तीसगढ़, भारत

हनीफ़ नज्मी आधुनिक उर्दू कविता की प्रमुख आवाज़ हैं।

हनीफ़ नज्मी आधुनिक उर्दू कविता की प्रमुख आवाज़ हैं।

हनीफ़ नज्मी के शेर

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जवाज़ कुछ नहीं होता हमारी ख़ुशियों का

उदास रहने का कोई सबब नहीं होता

वो इक जगह कहीं रह सका और उस के साथ

किराया-दार थे हम भी मकाँ बदलते रहे

हर शय को ज़मीं अपनी तरफ़ खींच रही है

कब आता है धरती पे गगन देखते रहना

अगर जहाँ में कोई आइना नहीं तेरा

तो फिर तुझी को तिरे रू-ब-रू करूँगा मैं

शा'इरी क्या है मिरी जाँ तुझे मा'लूम नहीं

एक तोहमत है जो मुझ पर भी लगा दी गई है

वो ख़फ़ा हैं तो रहें हम को मनाना भी नहीं

उन को आना भी नहीं हम को बुलाना भी नहीं

मिरी नज़र में कोई शय नहीं ठहरती है

तुम्हारा हुस्न मगर जम रहा है आँखों में

बस में जो कुछ था वो मैं ने कर दिया

अब वो 'इज़्ज़त दे कि ज़िल्लत दे मुझे

तिरे जमाल की देखी जो सादगी हम ने

बना लिया उसे उसलूब-ए-शा’इरी हम ने

'अजब क़ातिल हो तुम थकते नहीं हो क़त्ल करने से

कभी ख़ंजर तुम्हारा ख़ून से बे-दम नहीं होता

कीजिए क्या उन से अख़्लाक़-ओ-मुरव्वत की उमीद

ये हैं सब के सब नई तहज़ीब के पाले हुए

कमी कुछ अपने ही ज़ौक़-ए-तलब में है वर्ना

दु'आ का हर्फ़ कभी बे-असर नहीं जाता

मिली हम को शहादत तो क्या ये क्या कम है

कि सारी 'उम्र रह-ए-कर्बला पे चलते रहे

बंद हों आँखें तो दुनिया साफ़ आती है नज़र

हम यूँही आँखों पे पर्दा तो थे डाले हुए

जब से घर वाले ज़ियादा हम को समझाने लगे

भूल बैठे थे जिन्हें हम वो भी याद आने लगे

तिरी तलाश में निकला जो बू-ए-गुल की तरह

पलट के फिर वो कभी अपने घर नहीं जाता

इस शहर में किसी को मयस्सर था सुकूँ

रोना किसी को दिल का किसी को अना का था

तिरे ग़म ने 'अता की है 'अजब पाकीज़गी मुझ को

मैं रोता हूँ तो आँखों से मिरी ज़मज़म निकलता है

है दीदा-वर तो एक नज़र में परख मुझे

लाज़िम नहीं किसी को कई बार देखना

तू पुराने-पन पे मेरे इतना अफ़्सुर्दा हो

आने वाले कल को मैं फिर से नया हो जाऊँगा

मिरे मौला ये कैसा वसवसा आया मिरे दिल में

अब उस के सामने जाते हुए भी डर रहा हूँ मैं

ज़माने से मैं ना-क़द्री का शिकवा क्या करूँ 'नजमी'

ख़ुद अपनी ही नज़र से 'उम्र भर ओझल रहा हूँ मैं

भला वो ख़ाक समझेंगे ख़ुदा क्या है ख़ुदी क्या है

जो अब तक ये नहीं समझे मक़ाम-ए-आदमी क्या है

तू मेरे हक़ में कोई फ़ैसला अभी से कर

कि लम्हा लम्हा मैं ख़ुद को नया बनाता हूँ

बिसात-ए-ख़ाक पर बेहद क़द-आवर लग रहे थे जो

बुलंदी पर पहुँच कर वो बहुत छोटे नज़र आए

सूरज को जाने किस के तक़द्दुस का है ख़याल

मग़रिब की सम्त जब भी गया सर के बल गया

किसी का वस्ल तो जन्नत का ख़्वान है 'नजमी'

ये मन्न-व-सल्वा हमेशा नहीं उतरता है

हर हाल में ख़ुश रहना हर रोज़ ग़ज़ल कहना

हम ने यही जीने की इक राह निकाली है

रखता था वो भी मेरी रविश पर कड़ी निगाह

और मैं भी उस का चाल-चलन देखता रहा

मैं सादा-लौह करता भी क्या तेरे शहर में

चुप-चाप यार लोगों का फ़न देखता रहा

खिल उट्ठा मेरे दिल का चमन भी पस-ए-विसाल

ख़ित्ते तिरे बदन के भी शादाब हो गए

है धूप भी इस के लिए थोड़ी सी ज़रूरी

ये नख़्ल घनी छाँव में मुरझाने लगा है

काफ़ूर हुई जब से मिरे दिल की स्याही

हर चेहरा मुझे साफ़ नज़र आने लगा है

गुलशन में ये बहार रुकी ही रहेगी क्या

ये चाँदनी बदन की खिली ही रहेगी क्या

सफ़र हो ख़त्म तो शायद ये फ़ासला मिट जाए

अभी तो मैं हूँ ज़मीं पर वो आसमान पे है

तब्सिरा करते रहे हम ज़ुल्मतों पर

खो गया सारा असासा रौशनी में

शिकस्त कर सका कोई ग़ज़नवी उस को

वो एक बुत जो मिरे दिल के सोमनात में है

नशा वुजूद का जब तक उतर नहीं जाता

दिलों से खोट निगाहों से शर नहीं जाता

ये वस्ल की ख़्वाहिश भी मियाँ बुल-हवसी है

जिस दिल में मोहब्बत हो तमन्ना नहीं होती

नुक़्ता था लकीर था दायरा था

वो हर्फ़ था मैं जिस को किसी ने लिखा था

बज़्म में आते ही उस के बुझ गईं आँखें तमाम

सब के सब दीदार की हसरत लिए बैठे रहे

मिरे क़बीले का हर शख़्स मुझ से बद-ज़न है

मिरी ख़ता है बस इतनी कि सोचता हूँ मैं

उलझना लफ़्ज़ों से शेवा है कम-निगाहों का

जो दीदा-वर हैं वो बैनस्सुतूर देखते हैं

जब पहली बार गाँव से वो शहर को गया

हैरत से ऊँचे ऊँचे भवन देखता रहा

'इश्क़ में जल जल के कुंदन बन गया हूँ सर-बसर

अब भी क्या मेरा ख़ुदा दोज़ख़ में डालेगा मुझे

मिरे पैकर में लाखों सूरजों की आग पिन्हाँ है

ग़रीक़-ए-आब हूँ फिर भी मुसलसल जल रहा हूँ मैं

ये अलग बात कि साया है सलामत उस का

वर्ना दीवार तो चाहत की गिरा दी गई है

आग ऐसी है कुछ उस में कि बुझाना है मुहाल

बर्फ़ ऐसी है कि पिघला नहीं सकता कोई

उस में जो कुछ है 'अलावा हुस्न के

छाँट देता है मिरा तार-ए-नज़र

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