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इक़बाल सफ़ीपूरी

1921 - 1999 | कराची, पाकिस्तान

ग़ज़ल और नात के प्रसिद्ध शायर, जिगर मुरादाबादी के शागिर्द, अपने कलाम “दिल पे ज़ख़्म खाते हैं जान से गुज़रते हैं” के लिए मशहूर

ग़ज़ल और नात के प्रसिद्ध शायर, जिगर मुरादाबादी के शागिर्द, अपने कलाम “दिल पे ज़ख़्म खाते हैं जान से गुज़रते हैं” के लिए मशहूर

इक़बाल सफ़ीपूरी

ग़ज़ल 6

अशआर 4

मिरे लबों का तबस्सुम तो सब ने देख लिया

जो दिल पे बीत रही है वो कोई क्या जाने

कोई समझाए कि क्या रंग है मयख़ाने का

आँख साक़ी की उठे नाम हो पैमाने का

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चश्म-ए-साक़ी मुझे हर गाम पे याद आती है

रास्ता भूल जाऊँ कहीं मयख़ाने का

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कौन जाने कि इक तबस्सुम से

कितने मफ़्हूम-ए-ग़म निकलते हैं

पुस्तकें 1

 

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