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ख़िज़्र नागपुरी
अशआर 3
अज़ाब-ए-ज़िंदगी आख़िर अज़ाब-ए-आख़िरत निकला
हज़ारों बार मर-मर के यहाँ जीना पड़ा मुझ को
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किया इश्क़-ए-मजाज़ी ने हक़ीक़त आश्ना मुझ को
बुतों ने ज़ुल्म वो ढाया कि याद आया ख़ुदा मुझ को
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न रखना था कहीं का भी न रक्खा ज़ौक़-ए-हस्ती ने
तमाशा करना था आख़िर तमाशा कर दिया मुझ को
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ग़ज़ल 12
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