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मालिक राम का परिचय
पहचान: प्रख्यात शोधकर्ता, ग़ालिब विशेषज्ञ, अनुवादक और संपादक
मालिक राम बावेजा उर्दू जगत के प्रसिद्ध शोधकर्ता, संपादक और विशेष रूप से ग़ालिब विशेषज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने ग़ालिब की जीवनी, काव्य और पत्रों पर जिस गंभीरता, शोधपरकता और ईमानदारी से काम किया, उसने उन्हें बीसवीं सदी के अग्रणी ग़ालिब-विद्वानों की पंक्ति में ला खड़ा किया। शोध, संपादन, तज़किरा-लेखन और साहित्यिक इतिहास के क्षेत्र में भी उनकी सेवाएँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
मालिक राम का जन्म दिसंबर 1906 में कस्बा फालियां, ज़िला गुजरात (अब पाकिस्तान) में हुआ। पारिवारिक परंपराओं के अनुसार 22 दिसंबर 1906 अधिक प्रामाणिक तिथि मानी जाती है, जबकि सरकारी कागज़ात में गलती से 8 मार्च 1907 दर्ज हो गया। उनके पिता लाला निहाल चंद सप्लाई विभाग में कार्यरत थे और कुछ समय चीन में भी रहे। पिता के निधन के बाद उनकी माता भगवान देवी ने साहसपूर्वक बच्चों की परवरिश और शिक्षा का दायित्व निभाया।
प्रारंभिक शिक्षा गुरुद्वारा फालियां में हुई जहाँ उन्होंने गुरुमुखी और गुरबाणी सीखी। बाद में वर्नाक्युलर हाई स्कूल में दाख़िला लिया। 1924 में हाई स्कूल, 1926 में इंटरमीडिएट पूरा कर उच्च शिक्षा के लिए लाहौर गए। आई.वी. कॉलेज से बी.ए. और 1930 में गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से इतिहास में एम.ए. किया। 1933 में एल.एल.बी. की डिग्री ली। छात्र जीवन से ही उनकी साहित्यिक प्रतिभा स्पष्ट थी और उन्होंने निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कार जीते।
युवा अवस्था में उन्होंने “बज़्म-ए-अदब” नामक साहित्यिक संस्था स्थापित की। उनका लेख “ज़ौक़ और ग़ालिब” पत्रिका निगार में प्रकाशित हुआ जिससे उनकी पहचान बनी। बाद में वे प्रसिद्ध पत्रिका नैरंग-ए-ख़याल से जुड़े और उसके “इक़बाल नंबर” में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने अब्दुर्रहमान बज़नूरी के इक़बाल पर अंग्रेज़ी लेखों का उर्दू अनुवाद और टीकाएँ भी लिखीं जिन्हें ख़ुद अल्लामा इक़बाल ने सराहा।
1936 के बाद रोज़गार के सिलसिले में दिल्ली गए और 1939 में भारत सरकार के वाणिज्य विभाग से जुड़े। आगे चलकर इंडियन फ़ॉरेन सर्विस में शामिल हुए और मिस्र, इराक़, तुर्की, बेल्जियम आदि देशों में सेवाएँ दीं। 1965 में सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद पूरी तरह साहित्यिक और शोध कार्यों में लग गए।
उन्होंने मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की कृतियों का संपादन बड़े सलीके से किया और “इल्मी मजलिस” नामक संस्था स्थापित की। वे जामिया उर्दू के प्रो-वाइस चांसलर, ग़ालिब अकादमी के सदस्य और अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू के अध्यक्ष भी रहे, साथ ही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कोर्ट के सदस्य चुने गए।
उनकी प्रमुख पुस्तकों में ज़िक्र-ए-ग़ालिब, फ़साना-ए-ग़ालिब, तिलामिज़ा-ए-ग़ालिब, ख़ुतूत-ए-ग़ालिब, दीवान-ए-ग़ालिब, यादगार-ए-ग़ालिब, गुल-ए-राना, ग़ुबार-ए-ख़ातिर, ख़ुत्बात-ए-आज़ाद, तरजुमानुल-क़ुरआन, कर्बला कथा, जिगर बरेलवी: शख़्सियत और फ़न शामिल हैं। उन्होंने ग़ालिब के जीवन और काव्य को शोधपरक दृष्टि से व्यवस्थित किया और ग़ालिब अध्ययन में विश्वसनीय योगदान दिया।
शोध-दृष्टि, संतुलन और व्यापक अध्ययन के कारण मालिक राम का नाम क़ाज़ी अब्दुल वदूद और इम्तियाज़ अली अर्शी जैसे बड़े शोधकर्ताओं के साथ लिया जाता है। ग़ालिब अध्ययन में उनका काम आज भी मूल स्रोत माना जाता है।
निधन: मालिक राम का देहांत 1993 में हुआ।
सहायक लिंक : | https://en.wikipedia.org/wiki/Malik_Ram
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