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मोहम्मद बाक़र शम्स

1909 - 2007 | कराची, पाकिस्तान

कवि, आलोचक और शिक्षाविद् जिनकी कृतियों ने उपमहाद्वीप में उर्दू साहित्य, इतिहास और बौद्धिक चिंतन को गहराई से प्रभावित किया

कवि, आलोचक और शिक्षाविद् जिनकी कृतियों ने उपमहाद्वीप में उर्दू साहित्य, इतिहास और बौद्धिक चिंतन को गहराई से प्रभावित किया

मोहम्मद बाक़र शम्स के शेर

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मुस्कुराहट लब-ए-नाज़ुक पे निगाहें नीची

किस से सीखा है ये अंदाज़ दिल-आराई का

ख़ाक के ज़र्रों से उफ़ उफ़ की सदा आती है

मेरा अफ़्साना-ए-ग़म क़िस्सा-ए-माज़ी हुआ

लज़्ज़त-ए-ज़िंदगी वो क्या जाने

जिस को दर्द-ए-जिगर नहीं होता

सामना जब हुआ महशर में तो कुछ कह सका

मुझ से देखा गया उन का परेशाँ होना

हश्र में छोड़ दिया देख के उतरा हुआ मुँह

चुका था मिरे हाथों में गरेबाँ उन का

चारागर क्या समझ सकेंगे भला

दर्द कैसा है और दवा क्या है

आँखें लगी हैं दर पे निकलता नहीं है दम

ठहरी हुई है रूह तिरे इंतिज़ार में

कोई वीराना मिरे ज़ौक़ के क़ाबिल मिला

अब कहाँ ले के मुझे जाएगी वहशत मेरी

कभी दुनिया में फिर होगी सहर

हिज्र की शब अगर सहर हुई

नज़र लगने का उन के वास्ते गंडा बनाने को

बचा रक्खे हैं मैं ने तार कुछ अपने गरेबाँ में

कितने ही पा-ए-सनम पर किए सज्दे मैं ने

कभी पूरा हुआ शौक़ जबीं-साई का

देखा जो मुझ को फेर के मुँह मुस्कुरा दिए

बिजली गिरी तड़प के दिल-ए-बे-क़रार पर

है गोर-ए-ग़रीबाँ में वही 'शम्स' का मदफ़न

तुर्बत जो कोई दिल के धड़कने की सदा दे

आँख साक़ी से मिली जैसे ही मय-ख़ाने में

खिंच के मय गई पैमाने से पैमाने में

मिलते ही आँख उस फ़ुसूँ-गर से

दिल गया और हमें ख़बर हुई

बिजली गिराई तूर जलाया उड़ाए होश

इतना जलाल इक अरिनी के सवाल पर

देखा जो मैं ने नामा-ए-आ'माल हश्र में

क़िस्सा लिखा था मेरे और उन के शबाब का

ख़ौफ़-ए-महशर रहा दिल में जो देखा मैं ने

पुश्त पर मेरे गुनाहों के है रहमत उस की

हूक जब दिल से उठी ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ कर सका

राज़ इस घर का जो था मुझ से वो मख़्फ़ी हुआ

कुछ पूछो दराज़ी-ए-शब-ए-हिज्र

कट गई 'उम्र और सहर हुई

सब ज़ख़्म हैं हरे है लहू से क़बा भी सुर्ख़

लाया है रंग जोश-ए-जुनूँ फिर बहार में

फ़ित्ना-ज़ा वहशत-फ़ज़ा दाम-ए-क़ज़ा होते गए

जिस क़दर बढ़ते गए गेसू बला होते गए

शो'ला-ए-'इश्क़ अगर दिल में फ़रोज़ाँ हो जाए

बढ़ के ये क़तरा-ए-ख़ूँ महर-ए-दरख़्शाँ हो जाए

हुए आग़ाज़-ए-‘इश्क़ ही में हलाक

ग़र्क़ हम हो गए लब-ए-साहिल

आए 'अदम से गुलशन-ए-हस्ती की सैर को

दामन उलझ गया है यहाँ ख़ार-ज़ार में

मय-नोशी हक़ ने दार-ए-बक़ा में भी की हलाल

कहता है शैख़ दार-ए-फ़ना में हराम है

दम निकलता है तिरी ज़ुल्फ़ के सौदाई का

झिलमिलाता है सितारा शब-ए-तन्हाई का

ख़ुशा 'अह्द-ए-'अदम फ़िक्र से आज़ाद थे हम

एक दिन भी यहाँ क़ैद-ए-मिहन से निकले

क़ाबू में रक्खे अबलक़-ए-लैल-ओ-नहार को

देखा मैं ने ऐसा किसी शहसवार को

देखा जो दिन को उस ने सू-ए-चर्ख़-ए-बे-मदार

सोना उतर गया वरक़-ए-आफ़्ताब का

है 'अजब तरह की ये कश्मकश-ए-मौत-ओ-हयात

मैं जीने पे हूँ राज़ी वो मर जाने पर

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