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सलाम संदेलवी

1919 - 2000 | गोरखपुर, भारत

शेर 21

शबनम ने रो के जी ज़रा हल्का तो कर लिया

ग़म उस का पूछिए जो आँसू बहा सके

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ख़ुशी के फूल खिले थे तुम्हारे साथ कभी

फिर इस के ब'अद आया बहार का मौसम

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सौ बार आई होंटों पे झूटी हँसी मगर

इक बार भी दिल से कभी मुस्कुरा सके

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ये तो मालूम है उन तक सदा पहुँचेगी

जाने क्या सोच के आवाज़ दिए जाता हूँ

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क्या इसी को बहार कहते हैं

लाला-ओ-गुल से ख़ूँ टपकता है

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ग़ज़ल 3

 

पुस्तकें 20

Adab Ka Tanqeedi Mutala

 

1972

Adab ka Tanqeedi Mutala

 

 

Adabi Ishare

 

1969

Kaba Mein Sanam Khana

 

1959

Khwab-o-Khumar

 

1984

Marasi-e-Anees Mein Jazbati Taveel

 

1971

Mizaj-o-Mahol

 

1977

Mutala-o-Mushahida

 

1975

Nikhat-o-Noor

 

1955

Saghar-o-Meena

 

1949

"गोरखपुर" के और लेखक

  • अब्दुल ख़ालिक़ अब्दुल ख़ालिक़