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शरफुद्दीन यहया मनेरी का परिचय
पहचान: महान सूफ़ी संत, सिलसिला-ए-फ़िरदौसिया के प्रतिष्ठित पेशवा, मकतूबात के लेखक और भारतीय उपमहाद्वीप में तसव्वुफ़ व रूहानियत के प्रभावशाली प्रचारक
हज़रत मख़दूम-उल-मुल्क शेख़ शरफ़ुद्दीन अहमद यह्या मनेरी, जो “मख़दूम-ए-जहाँ” और “मख़दूम-उल-मुल्क बिहारी” के नाम से भी प्रसिद्ध हैं, भारतीय उपमहाद्वीप के महान सूफ़ियों में गिने जाते हैं।
शेख़ शरफ़ुद्दीन अहमद यह्या मनेरी का जन्म शाबानुल-मुअज्ज़म 661 हिजरी मुताबिक 1263 ईस्वी में मनेर शरीफ़, ज़िला पटना में हुआ। उनके पिता शेख़ कमालुद्दीन यह्या मनेरी सिलसिला-ए-सुहरवर्दिया के बुज़ुर्ग थे, जबकि उनकी माता बीबी रज़िया एक प्रतिष्ठित रूहानी ख़ानदान से ताल्लुक रखती थीं। उनके नाना सैयद शिहाबुद्दीन सुहरवर्दी उर्फ़ पीर जगजोत हिंदुस्तान में सिलसिला-ए-सुहरवर्दिया के शुरुआती बुज़ुर्गों में शामिल थे और हज़रत शिहाबुद्दीन उमर सुहरवर्दी के सीधे शागिर्द थे। इसी रूहानी और इल्मी माहौल ने बचपन से ही उनके व्यक्तित्व को तसव्वुफ़, ज़ुह्द और इल्म की ओर प्रवृत्त किया।
प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने कम उम्र में ही अरबी, फ़ारसी, तर्कशास्त्र, दर्शन और दीनियत की शिक्षा प्राप्त करनी शुरू कर दी। इस उद्देश्य से उन्होंने बंगाल के प्रसिद्ध आलिम हज़रत शरफ़ुद्दीन अबू तव्वामा बुख़ारी से लगभग चौबीस वर्षों तक शिक्षा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त किया। बाद में वे दिल्ली गए, जहाँ उस समय के महान सूफ़ियों और विद्वानों से मुलाकात हुई। वहीं उनके बड़े भाई मख़दूम जलीलुद्दीन मनेरी ने उन्हें शेख़ नजीबुद्दीन फ़िरदौसी से मिलवाया, जिनसे उन्होंने बैअत की और सिलसिला-ए-फ़िरदौसिया से जुड़ गए। इसी कारण उन्हें “फ़िरदौसी” भी कहा जाता है।
हज़रत मख़दूम-ए-जहाँ ने सांसारिक सुख-सुविधाओं से दूर रहकर मुजाहदा, रियाज़त और रूहानी साधना का मार्ग अपनाया। उन्होंने बिहिया के जंगलों और बाद में राजगीर की पहाड़ियों में लंबे समय तक इबादत, ज़िक्र और साधना में जीवन बिताया। राजगीर में जिस स्थान पर वे इबादत किया करते थे, वहाँ का गर्म जलस्रोत आज भी “मख़दूम कुंड” के नाम से प्रसिद्ध है। लगभग तीस वर्षों की तपस्या और एकांतवास के बाद वे बिहार शरीफ़ लौटे, जहाँ उनकी इल्मी और रूहानी महानता की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। सुल्तान मुहम्मद तुगलक़ ने उनके लिए एक ख़ानकाह बनवाई, जहाँ उन्होंने मुरीदों की तालीम, तरबियत और तसव्वुफ़ की शिक्षा का महान कार्य किया।
हज़रत मख़दूम-ए-जहाँ की वास्तविक महानता उनकी रूहानी शिक्षाओं, मकतूबात और मलफ़ूज़ात में दिखाई देती है। उनके मकतूबात को तसव्वुफ़ में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और उन्हें सुलूक व मारिफ़त की व्यवहारिक राहनुमाई का विश्वसनीय स्रोत समझा जाता है। “मकतूबात-ए-सदी”, “मकतूबात-ए-बिस्त-ओ-हश्त” और “फ़वायद-ए-रुक्नी” उनकी महत्वपूर्ण रचनाओं में शामिल हैं। इन लेखनों में तसव्वुफ़, नैतिकता, मारिफ़त-ए-इलाही, आत्मशुद्धि और मानवीय चरित्र सुधार पर गहरे विचार मिलते हैं। उनकी शिक्षाओं में शरीअत और तरीक़त का सुंदर समन्वय दिखाई देता है, जहाँ रूहानी उन्नति के साथ नैतिक पवित्रता और मानव सेवा को भी विशेष महत्व दिया गया है।
हज़रत मख़दूम-ए-जहाँ की ख़ानकाह भारतीय उपमहाद्वीप में रूहानी, इल्मी और सामाजिक केंद्र बन गई थी। उनके शिष्यों में उलेमा, सूफ़ी, शासक और आम लोग सभी शामिल थे। उन्होंने तसव्वुफ़ को केवल एकांत साधना तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे मानवता, नैतिक सुधार और आध्यात्मिक प्रशिक्षण का माध्यम बनाया। इसी कारण उन्हें “मख़दूम-ए-जहाँ” की उपाधि मिली और उनकी शख़्सियत सदियों से श्रद्धा का केंद्र बनी हुई है।
निधन: आपका इंतक़ाल 5 शव्वाल 786 हिजरी मुताबिक 1380 ईस्वी की रात हुआ। आपका मज़ार बिहार शरीफ़, ज़िला नालंदा में स्थित “बड़ी दरगाह” में है, जहाँ हर साल शव्वाल के महीने में पाँच दिवसीय उर्स श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया जाता है।
सहायक लिंक : | https://en.wikipedia.org/wiki/Sharfuddin_Yahya_Maneri
प्राधिकरण नियंत्रण :लाइब्रेरी ऑफ कॉंग्रेस नियंत्रण संख्या : n80040239
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