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सय्यद सिब्ते हसन

1912 - 1986 | पाकिस्तान

लेख 14

उद्धरण 10

रियासत के हुदूद-ए-अर्बा घटते-बढ़ते रहते हैं, मगर क़ौमों और क़ौमी तहज़ीबों के हुदूद बहुत मुश्किल से बदलते हैं।

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रियासत फ़क़त एक जुग़राफ़ियाई या सियासी हक़ीक़त होती है। चुनाँचे यह ज़रूरी नहीं है कि रियासत और क़ौम की सरहदें एक हो।

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अगर कोई मुआ'शरा रूह-ए-अस्र की पुकार नहीं सुनता, बल्कि पुरानी डगर पर चलता रहता है, तो तहज़ीब का पौधा भी ठिठुर जाता है और फिर सूख जाता है।

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तहरीर का रिवाज भी तमद्दुन ही का मज़हर है, क्योंकि वह मुआशरा जो फ़न-ए-तहरीर से ना-वाक़िफ़ हो मुहज़्ज़ब कहा जा सकता है, लेकिन मुतमद्दिन नहीं कहा जा सकता।

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रस्म-उल-ख़त की इस्लाह की बहस को मज़हबी रंग दें, क्योंकि रस्म-उल-ख़त का तअ'ल्लुक़ मज़हब से नहीं है।

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पुस्तकें 20

Adab Aur Raushan Khayali

 

1990

Al-Najmat-ul-Saira

Muheetul Daaira

 

आज़ादी की नज़्में

 

1985

Azadi Ki Nazmein

 

1940

Azadi Ki Nazmein

 

2007

Inqalab-e-Iran

 

1980

Marx Aur Mashriq

 

2009

Mazi Ke Mazar

 

1996

Mazi Ke Mazar

 

1984

मूसा से मार्क्स तक

 

1977