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रद करें डाउनलोड शेर

अहमद सलमान

ग़ज़ल 4

 

अशआर 5

सब ने माना मरने वाला दहशत-गर्द और क़ातिल था

माँ ने फिर भी क़ब्र पे उस की राज-दुलारा लिक्खा था

कुचल कुचल के फ़ुटपाथ को चलो इतना

यहाँ पे रात को मज़दूर ख़्वाब देखते हैं

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मैं हूँ भी तो लगता है कि जैसे मैं नहीं हूँ

तुम हो भी नहीं और ये लगता है कि तुम हो

जो दिख रहा उसी के अंदर जो अन-दिखा है वो शायरी है

जो कह सका था वो कह चुका हूँ जो रह गया है वो शायरी है

वो जिन दरख़्तों की छाँव में से मुसाफ़िरों को उठा दिया था

उन्हीं दरख़्तों पे अगले मौसम जो फल उतरे तो लोग समझे

चित्र शायरी 1

 

वीडियो 6

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ऑडियो 3

जो दिख रहा है उसी के अंदर जो अन-दिखा है वो शा'इरी है

जो हम पे गुज़रे थे रंज सारे जो ख़ुद पे गुज़रे तो लोग समझे

शबनम है कि धोका है कि झरना है कि तुम हो

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