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आलम ख़ुर्शीद

1959 | पटना, भारत

महत्वपूर्ण उत्तर-आधुनिक शायर।

महत्वपूर्ण उत्तर-आधुनिक शायर।

आलम ख़ुर्शीद

ग़ज़ल 48

अशआर 28

इश्क़ में तहज़ीब के हैं और ही कुछ फ़लसफ़े

तुझ से हो कर हम ख़फ़ा ख़ुद से ख़फ़ा रहने लगे

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बहुत सुकून से रहते थे हम अँधेरे में

फ़साद पैदा हुआ रौशनी के आने से

पूछ रहे हैं मुझ से पेड़ों के सौदागर

आब-ओ-हवा कैसे ज़हरीली हो जाती है

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हाथ पकड़ ले अब भी तेरा हो सकता हूँ मैं

भीड़ बहुत है इस मेले में खो सकता हूँ मैं

मैं ने बचपन में अधूरा ख़्वाब देखा था कोई

आज तक मसरूफ़ हूँ उस ख़्वाब की तकमील में

पुस्तकें 12

वीडियो 11

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

आलम ख़ुर्शीद

आलम ख़ुर्शीद

आलम ख़ुर्शीद

आलम ख़ुर्शीद

मैं जिस जगह भी रहूँगा वहीं पे आएगा

आलम ख़ुर्शीद

याद करते हो मुझे सूरज निकल जाने के बा'द

आलम ख़ुर्शीद

हमेशा दिल में रहता है कभी गोया नहीं जाता

आलम ख़ुर्शीद

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