आशकारा ख़ानम कश्फ़ का परिचय
जन्म : 11 Nov 1977 | अमरोहा, उत्तर प्रदेश
संबंधी : सुहैब फ़ारूक़ी (पति)
आशकारा खानम 'कश्फ़' का जन्म 11 नवम्बर 1977 को उत्तर प्रदेश के जनपद अमरोहा स्थित कस्बा सिहाली जागीर में हुआ। आपने रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में परास्नातक की उपाधि प्राप्त की, जबकि उर्दू भाषा एवं साहित्य में अदीब कामिल और मुअल्लिम की योग्यताएँ भी अर्जित कीं। शिक्षा के क्षेत्र से गहरे जुड़ाव के दौरान आपने गजरौला के एक प्रतिष्ठित निजी शिक्षण संस्थान में प्राचार्या के रूप में सेवाएँ दीं तथा शैक्षिक एवं प्रशासनिक दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया।
जून 2001 में आपका विवाह जनाब सुहैब फ़ारूक़ी साहब से हुआ, जो दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी होने के साथ-साथ प्रतिष्ठित उर्दू शायर और लेखक भी हैं। विवाहोपरांत आप दिल्ली में निवासरत हुईं, जहाँ का साहित्यिक वातावरण और वैचारिक रफ़ाक़त आपके रचनात्मक सफ़र की प्रेरणा बने। इसी दौर में आपने शायरी की ओर गंभीरता से रुख़ किया और अपने लिए 'कश्फ़' तख़ल्लुस इख़्तियार किया, जिसका अर्थ है— अनावरण, सत्य का प्रकटन अथवा किसी छिपी हुई वास्तविकता का उद्घाटन।
शायरी की विधिवत तालीम और फ़न की परिपक्व समझ के लिए आपने मरहूम क़ाज़ी अबरार किरतपुरी साहब की शागिर्दी इख़्तियार की और उनके दस्त-ए-मुबारक से शर्फ़-ए-तलम्मुज़ हासिल किया। उनकी रहनुमाई में आपने ग़ज़ल की बारीकियों, फ़न-ए-सुख़न के विविध आयामों तथा इल्म-ए-अरूज़ के सूक्ष्म सिद्धांतों का गहन अध्ययन किया। निरंतर अध्ययन, रियाज़ और मश्क़-ए-सुख़न के परिणामस्वरूप आपने न केवल एक विशिष्ट शायरा के रूप में अपनी पहचान स्थापित की, बल्कि इल्म-ए-अरूज़ पर अपनी गहरी पकड़ के कारण अदबी हलकों में एक माहिर-ए-अरूज़ के रूप में भी सम्मान अर्जित किया।
आपकी शायरी में एहसास की नर्मी, फ़िक्र की गहराई, सामाजिक चेतना और स्त्री-अनुभवों की अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति दिखाई देती है। ग़ज़ल आपकी प्रिय विधा है और अब तक आपकी सौ से अधिक ग़ज़लें मुकम्मल हो चुकी हैं, जिनका संकलन प्रकाशनाधीन है। दिल्ली तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में आयोजित होने वाले प्रमुख मुशायरों, साहित्यिक आयोजनों और अकादमिक मंचों पर आपकी नियमित एवं सम्मानजनक शिरकत रही है।
आशकारा खानम 'कश्फ़' समकालीन उर्दू शायरी की उन उभरती हुई आवाज़ों में शामिल हैं, जो अपने ख़ुलूस, फ़िक्र की गहराई और सहज किन्तु प्रभावशाली अभिव्यक्ति के माध्यम से मानवीय अनुभवों और अपने समय के सरोकारों को काव्यात्मक रूप प्रदान करती हैं।