चरण सिंह बशर के शेर
ये दुनिया नफ़रतों के आख़री स्टेज पे है
इलाज इस का मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं है
कोई बस्ती में बशर जैसा नज़र आता नहीं
सख़्त उलझन में हैं वीराने किसे आवाज़ दें
दंगे में तो हलाक हुए बे-शुमार लोग
कल किस तरह छपेगी ख़बर देखना ये है
अगर ज़िंदा ही रहना है तो रहिए अपनी शर्तों पर
कि ख़ुद्दारी से ख़ाली लोग सौ सौ बार मरते हैं
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होंटों पे खिल रहे हैं सदाक़त के चंद फूल
नेज़े पे कब बुलंद हो सर देखना ये है
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दूर तक उम्मीद की कोई किरन बाक़ी नहीं
हो चुके अपने भी बेगाने किसे आवाज़ दें
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