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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के लेख
फ़ैज़ का जमालियाती एहसास और मानियाती निज़ाम
(1) शायरी की अहमियत और महानता का असली फ़ैसला वक़्त करता है। मीर और ग़ालिब अपने दौर में ज़माने की नाक़द्री (कद्र न होने) की बराबर शिकायत करते रहे, लेकिन वक़्त के साथ-साथ उनकी महानता की छाप रौशन होती गई। इसी मायने में वक़्त या ज़माना कोई अमूर्त विचार
इक़बाल, फैज़ और हम
मैं उर्दू मरकज़ लंदन के पदाधिकारियों और सदस्यों का आभारी हूँ कि उन्होंने फ़ैज़ की पहली बरसी के मौक़े पर मुझे लंदन आने और पहला फ़ैज़ मेमोरियल लेक्चर देने का निमंत्रण दिया। फ़ैज़ की याद में लेक्चरों के सिलसिले की यह शुरुआत एक सराहनीय क़दम है और उम्मीद
फ़ैज़ और क्लासिकी ग़ज़ल
फ़ैज़ की ग़ज़ल का ज़िक्र करते वक़्त आम तौर पर जो बात सबसे पहले कही जाती है, वह यह है कि फ़ैज़ ने क्लासिकी प्रतीकों (अलामतों) को नए अर्थ और नई सार्थकता दी। यह भी कहा गया कि फ़ैज़ की लोकप्रियता की एक बड़ी वजह उनके काम करने के तरीक़े में है, जिसके कारण
फ़ैज़ को कैसे ना पढ़ें: एक पस साख़्तिती रवय्या
या'नी फ़ैज़ को कैसे न पढ़ें। इसके बग़ैर तो चारा नहीं, या फ़ैज़ को कैसे नहीं पढ़ना चाहिए, या'नी फ़ैज़ की क़िराअत कैसे नहीं करना चाहिए। यहाँ मक़सूद मुअख़्ख़रुज़्ज़िक्र है लेकिन मुज़ारेअ् के साथ कि कैसे न पढ़ें, आमिराना "चाहिए, के साथ नहीं। ख़ाकसार को मन्फ़ी