फ़रहाद अहमद फ़िगार के शेर
मैं जितनी देर बयाबाँ में था तो इंसाँ था
ज़रा जो शहर में आया दरिंदा हो गया मैं
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किस सुहूलत से जान ली मेरी
उस ने हर बात मान ली मेरी
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मज़दूरों के नाम पे अब के भी
कुछ लोगों ने सिर्फ़ सियासत की
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