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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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ख़ुशबीर सिंह शाद

1954 | जालंधर, भारत

सबसे महत्वपूर्ण समकालीन शायरों में से एक, लोकप्रियता भी हासिल।

सबसे महत्वपूर्ण समकालीन शायरों में से एक, लोकप्रियता भी हासिल।

ख़ुशबीर सिंह शाद

ग़ज़ल 27

अशआर 36

ये तेरा ताज नहीं है हमारी पगड़ी है

ये सर के साथ ही उतरेगी सर का हिस्सा है

रफ़्ता रफ़्ता सब तस्वीरें धुँदली होने लगती हैं

कितने चेहरे एक पुराने एल्बम में मर जाते हैं

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ज़रा ये धूप ढल जाए तो उन का हाल पूछेंगे

यहाँ कुछ साए अपने आप को पैकर बताते हैं

कुछ तलब में भी इज़ाफ़ा करती हैं महरूमियाँ

प्यास का एहसास बढ़ जाता है सहरा देख कर

रगों में ज़हर-ए-ख़ामोशी उतरने से ज़रा पहले

बहुत तड़पी कोई आवाज़ मरने से ज़रा पहले

पुस्तकें 12

वीडियो 13

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ऑडियो 6

इस इंतिशार का कोई असर भी है कि नहीं

परिंदे बे-ख़बर थे सब पनाहें कट चुकी हैं

बुझा के मुझ में मुझे बे-कराँ बनाता है

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