मजनूँ गोरखपुरी के लेख
तख़्लीक़-ओ-तंक़ीद
आलोचना क्या है या वह कौन सा मुख्य ज़रूरी तत्व है जिसके बिना आलोचना, आलोचना नहीं हो सकती। आज से एक-दो पीढ़ी पहले यह सवाल कभी उठाया नहीं गया। इसलिए कि तब तक कलाकार और आलोचक के बीच कोई स्पष्ट फ़र्क़ महसूस नहीं किया जाता था। दोनों का ख़याल एक साथ ज़ेहन में
अदब और मक़सद
हज़रात! जिस वक़्त आप लोगों ने इस अंजुमन (सभा) के अध्यक्ष के लिए मेरा नाम पेश किया, तो मेरे अंदर पहली स्वाभाविक इच्छा यह पैदा हुई कि मैं अपना नाम वापस ले लूं और अपनी जगह किसी ऐसे व्यक्ति का नाम पेश करूं जो शारीरिक और मानसिक रूप से मुझसे बेहतर हो, और
अदब और तरक़्क़ी
शायर की आवाज़ हो कि गायक का स्वर जिस से चमन उदास हो वह सुबह की हवा क्या - इक़बाल कोई नौ-दस साल का अरसा हुआ, भौतिक विज्ञान के एक मशहूर माहिर ने भौतिक दुनिया के मुताल्लिक़ हमारे ख़यालात और रुझानों में जो तब्दीलियां हुई हैं, उनको संक्षेप में यूं बयान
ग़ज़ल और अस्र-ए-जदीद
एक समीक्षक की राय है कि शायरी नई दुनिया के लिए बहुत कम अहमियत रखती है और आजकल की इंसानियत को शायरी की कुछ ज़्यादा परवाह नहीं है। इसके खंडन में ढेरों अशआर पेश किए जा सकते हैं जो इस वक़्त भी दुनिया के हर कोने में आए दिन रचे जा रहे हैं। इससे इनकार नहीं