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कवि, अनुवादक और उर्दू-अंग्रेज़ी के द्विभाषी लेखक हैं, जिन्हें शास्त्रीय संगीत में भी विशेष रुचि है।

कवि, अनुवादक और उर्दू-अंग्रेज़ी के द्विभाषी लेखक हैं, जिन्हें शास्त्रीय संगीत में भी विशेष रुचि है।

मोहम्मद शहज़ाद द्वारा अनुवाद

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सुर्ख़ फूल

वसेवोलोड मिखाइलोविच गार्शिन

ये कहानी रूसी मुसन्निफ़ वसेवोलोड गार्शिन (Vsevolod Garshin) के मशहूर अफ़साने 'सुर्ख़ फूल' (The Red Flower) का उर्दू तर्जुमा है। ये एक ऐसे शदीद ज़ेहनी मरीज़ की दास्तान है जिसे पागल-ख़ाने लाया जाता है। मरीज़ ख़ुद को एक अज़ीम आलमी मिशन पर मामूर समझता है जहाँ उसका मक़सद दुनिया से तमाम बुराइयों का ख़ात्मा करना है। हॉस्पिटल के बाग़ में उगे हुए एक शोख़ सुर्ख़ फूल को वो काएनात की तमाम-तर बुराइयों और मन्फ़ी ताक़तों का मरकज़ समझ बैठता है। अपने जुनून में वो उस फूल को तोड़ कर अपने सीने से छुपा लेता है ताकि उसके ज़हर को अपने अन्दर जज़्ब कर के दुनिया को शर से निजात दिला सके। ये कहानी इंसानी नफ़सियात, दीवानगी, और ख़ैर-ओ-शर के दरमियान जारी एक मुबहम मगर दर्दनाक जंग की अक्कासी करती है।

कोच-वान का क़दम!

वसेवोलोड मिखाइलोविच गार्शिन

गारशिन का ये अफ़्साना रूसी ज़बान में "То, чего не было (To, chego ne bylo)" नाम से शाए हुआ, जिसका अंग्रेज़ी तर्जुमा मुतअद्दिद उन्वान ("That Which Was Not", "Make-Believe", "What Was Not") से शाए हुआ। इस कहानी में इंसानी ज़िंदगी के बारे में उनके महदूद और मुतज़ाद फ़लसफ़ों का एक तंज़िया तज्ज़िया है। हर किरदार अपने महदूद तजरुबे को ही पूरी सच्चाई समझता है, जबकि क़ुदरत का निज़ाम उन तमाम नज़रियात से बे-नियाज़ हो कर किसी भी लम्हे सब को रौंद सकता है। मुसन्निफ़ इस हक़ीक़त को नुमायाँ करना चाहता है कि इंसान अपनी बे-बसी और नाकामियों को भी बड़े-बड़े जज़्बाती और फ़लसफ़ियाना दावों से छिपाने का आदी है। ज़िंदगी की तमाम-तर बहसें और फ़लसफ़े एक हादसे (कोचवान के क़दम) के आगे दम तोड़ देते हैं, और बाक़ी बच जाने वाले किरदार अपनी मामूली चोटों को भी "अज़ीम क़ुर्बानी" का रंग दे कर झूठ और मुबालग़ा-आराई में पनाह ढूँढ लेते हैं।

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