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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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रईस अमरोहवी

1914 - 1988 | कराची, पाकिस्तान

रईस अमरोहवी

ग़ज़ल 42

नज़्म 5

 

अशआर 19

ख़ामोश ज़िंदगी जो बसर कर रहे हैं हम

गहरे समुंदरों में सफ़र कर रहे हैं हम

हम अपनी ज़िंदगी तो बसर कर चुके 'रईस'

ये किस की ज़ीस्त है जो बसर कर रहे हैं हम

सिर्फ़ तारीख़ की रफ़्तार बदल जाएगी

नई तारीख़ के वारिस यही इंसाँ होंगे

किस ने देखे हैं तिरी रूह के रिसते हुए ज़ख़्म

कौन उतरा है तिरे क़ल्ब की गहराई में

पहले ये शुक्र कि हम हद्द-ए-अदब से बढ़े

अब ये शिकवा कि शराफ़त ने कहीं का रखा

हास्य 7

क़ितआ 4

 

नअत 1

 

पुस्तकें 31

वीडियो 18

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