रय्यान अबुलउलाई के लेख
ख़्वाजा साहब पर क्या कहती हैं पुरानी किताबें?
ये मज़मून ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की शख़्सियत और करामात के ताल्लुक़ से पाई जाने वाली बाज़ बुनियादी ग़लतियों और मन-घढ़त कहानियों के हवाले से लिखा गया है, इस में ये बताया गया है कि ख़्वाजा बुज़ुर्ग से मंसूब मुख़्तलिफ़ अदवार के वाक़िआत को किस क़दर तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है, चंद बुनियादी माख़ज़ात का भी ज़िक्र किया गया है ताकि सवानेही और तारीख़ी कुतुब से मुवाज़ना किया जा सके, नीज़ तारीख़ी शवाहिद की रौशनी में इन अग़लात की निशान-देही भी की गई है, इस मज़मून का बुनियादी मक़्सद ये याद दिलाना है कि हमें मन-घढ़त कहानियों के बजाय ख़्वाजा बुज़ुर्ग के आला अख़्लाक़, मोहब्बत, रवादारी और भाई-चारे पर मबनी उन अस्ल तलीमात को आम करना चाहिए जो आज आठ सौ साल गुज़रने के बाद भी मुआशरे के लिए यकसाँ तौर पर मुफ़ीद और अहम हैं।