शाह नसीर
ग़ज़ल 71
अशआर 96
ग़ुरूर-ए-हुस्न न कर जज़्बा-ए-ज़ुलेख़ा देख
किया है इश्क़ ने यूसुफ़ ग़ुलाम आशिक़ का
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उस काकुल-ए-पुर-ख़म का ख़लल जाए तो अच्छा
क़दम न रख मिरी चश्म-ए-पुर-आब के घर में
ख़ाल-ए-मश्शाता बना काजल का चश्म-ए-यार पर
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