शमीम तारिक़ का परिचय
क़बीला-वार अदावत का सिलसिला 'तारिक़'
फ़साद-ए-शहर की सूरत में अब भी चलता है
पहचान: शोधकर्ता, आलोचक, कवि और स्तंभकार
शमीम तारिक का जन्म 8 अगस्त 1952 को वाराणसी (बनारस) में हुआ। उन्होंने शोध, आलोचना, कविता, पत्रकारिता और वैचारिक विमर्श के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी स्थायी निवास-स्थली मुंबई रही, जहाँ वे अंजुमन-ए-इस्लाम के अधीन संचालित करीमी लाइब्रेरी के निदेशक भी रहे और 2019 तक इस पद पर कार्यरत रहे। इसी संस्था के अंतर्गत स्थापित अंजुमन इस्लाम उर्दू रिसर्च इंस्टिट्यूट तथा उसके त्रैमासिक पत्र “नवाए अदब” से भी जुड़े रहे।
शमीम तारिक ने उर्दू आलोचना और शोध को नए वैचारिक आयाम प्रदान किए। सूफ़ीवाद, भक्ति आंदोलन, इक़बाल अध्ययन, ग़ालिब अध्ययन, अमीर ख़ुसरो, टैगोर और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा पर उनका कार्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। उनकी रचनाओं में धार्मिक एवं सांस्कृतिक सौहार्द, मानवीय एकता, आध्यात्मिक मूल्य और समकालीन चेतना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उन्होंने सूफ़ी और वेदांती चिंतन के तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से साझा मानवीय मूल्यों को उजागर करने का गंभीर प्रयास किया।
उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “तसव्वुफ़ और भक्ति” को 2015 में उर्दू भाषा के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुस्तक सूफ़ी और भक्ति परंपराओं के बीच वैचारिक और आध्यात्मिक समानताओं का गंभीर अध्ययन प्रस्तुत करती है। उनकी अन्य महत्वपूर्ण पुस्तकों में “फ़हम-ए-इक़बाल”, “ग़ालिब और हमारी तहरीक-ए-आज़ादी”, “ग़ालिब, बहादुर शाह ज़फ़र और सन 1857”, “शरफ़-ए-मिहनत व किफ़ालत”, “सूफ़िया का भगती राग” और “काली दास गुप्ता रज़ा” आदि शामिल हैं।
शमीम तारिक एक सक्रिय पत्रकार और स्तंभकार भी हैं। वे दैनिक “इंक़िलाब” में राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक विषयों पर नियमित रूप से लेख लिखते रहे हैं। उनकी गद्य शैली में सरसता, वैचारिक गहराई और तर्कशीलता का सुंदर संगम मिलता है, जबकि उनकी कविता में आध्यात्मिक पीड़ा, मानवता और समकालीन संवेदना प्रमुख रूप से उभरती है।
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