वाजिदा तबस्सुम का परिचय
जन्म : 16 Mar 1935 | अमरावती, महाराष्ट्र
निधन : 07 Dec 2011 | मुंबई, महाराष्ट्र
उठ के महफ़िल से मत चले जाना
तुम से रौशन ये कोना कोना है
पहचान: उर्दू साहित्य की बेबाक और साहसी कहानीकार, उपन्यासकार तथा हैदराबाद दकन की पतनशील जागीरदारी तहज़ीब की गहरी समझ रखने वाली लेखिका
वाजिदा तबस्सुम का जन्म 16 मार्च 1935 को अमरावती, महाराष्ट्र में हुआ। कम उम्र में ही माता-पिता के निधन के कारण उन्हें अनाथपन, आर्थिक तंगी और वंचना का सामना करना पड़ा।
1947 के सांप्रदायिक दंगों और भारत-विभाजन के परिणामस्वरूप उनका पूरा परिवार अमरावती से हैदराबाद दकन चला गया। इन घटनाओं और विस्थापन के अनुभव ने उनके व्यक्तित्व और साहित्यिक चिंतन को गहराई से प्रभावित किया।
उन्होंने हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में उच्च शिक्षा प्राप्त की। छात्र जीवन से ही उनका झुकाव रचनात्मक लेखन की ओर था।
1960 में उनका विवाह उनके चचेरे भाई अशफाक अहमद से हुआ, जो भारतीय रेल सेवा से जुड़े थे। विवाह के बाद वे मुंबई में बस गईं।
उनकी कहानियाँ पहली बार प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका “बीसवीं सदी” में प्रकाशित हुईं और शीघ्र ही वे साहित्यिक जगत का चर्चित नाम बन गईं।
वाजिदा तबस्सुम, इस्मत चुगताई के बाद उर्दू की उन चुनिंदा कहानीकारों में शामिल हैं जिन्होंने अपनी बिल्कुल अलग और विशिष्ट शैली विकसित की। उनकी भाषा में दकनी मुहावरे, स्त्री-सुलभ लहजा, व्यंग्य, चुटीलापन और गहरा सांस्कृतिक रंग दिखाई देता है।
उन्होंने हैदराबाद के पतनशील अभिजात वर्ग, नवाबों की विलासी जीवन-शैली, बेगमों, कनीज़ों, वर्गीय असमानता, आर्थिक संकट, स्त्री-मन और यौन शोषण को अपनी रचनाओं का विषय बनाया।
इस्मत चुगताई और सआदत हसन मंटो की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने उन वर्जित विषयों और यौन यथार्थों को साहित्यिक गरिमा के साथ प्रस्तुत किया, जिन पर आमतौर पर लिखने से परहेज़ किया जाता था। इसी निर्भीकता के कारण उन्हें आलोचना और विवादों का भी सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने रचनात्मक दृष्टिकोण से कभी समझौता नहीं किया।
“शहर-ए-ममनूअ” (1960), जो उनका पहला और अत्यंत लोकप्रिय कहानी-संग्रह था, “तौबा तौबा”, “तहख़ाना”, “आया बसंत सखी” (1974) और “उतरन” (1977) उनके प्रमुख कहानी-संग्रह हैं। उन्होंने “शोले”, “सातवाँ फेरा” और “नथ की इज़्ज़त” नामक उपन्यास भी लिखे।
उनकी कहानी “उतरन” उर्दू कथा-साहित्य की सबसे लोकप्रिय कहानियों में गिनी जाती है, जिस पर बाद में सफल टेलीविज़न धारावाहिक और फ़िल्में भी बनाई गईं।
“तीन जनाज़े”, “गुलिस्ताँ से क़ब्रिस्तान तक”, “काले बादल”, “सुहागन”, “नागिन”, “ईदी”, “आग में फूल”, “ज़रा होर ऊपर”, “नथ का गुरूर”, “नाथ का बोझ” और “नथ उतरवाई” उनकी प्रसिद्ध कहानियों में शामिल हैं।
जीवन के अंतिम वर्षों में वे गठिया (Arthritis) की गंभीर बीमारी से पीड़ित रहीं, जिसके कारण उन्होंने एकांतवास अपना लिया। इसके बावजूद उनकी साहित्यिक प्रतिष्ठा और प्रभाव कायम रहा।
उनकी साहित्यिक सेवाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया और उनकी कुछ कहानियाँ अमेरिका के विश्वविद्यालयों, विशेषकर शिकागो विश्वविद्यालय, के पाठ्यक्रम में शामिल की गईं।
निधन: वाजिदा तबस्सुम का निधन 7 दिसंबर 2011 को मुंबई में हुआ।
सहायक लिंक : | https://en.wikipedia.org/wiki/Wajida_Tabassum