वज़ीर आग़ा के लेख
इंशाइया क्या है?
इनशाइया क्या है? पहली नज़र में इनशाइया या एस्से की सीमाएँ तय करना एक खासा कठिन काम है क्योंकि न सिर्फ ऐतिहासिक दृष्टि से इनशाइया के अर्थ और रूप में कई क्रांतिकारी बदलाव आए हैं, बल्कि हर इनशाइया विषय-वस्तु और तकनीक, दोनों ही लिहाज़ से एक अलग स्थिति रखता
जदीदियत और मा-बाद-ए-जदीदियत
पिछले दिनों उर्दू अकादमी दिल्ली के आयोजन में माबाद जदीदियत (उत्तर-आधुनिकता) के विषय पर एक सेमिनार आयोजित हुआ। इस राष्ट्रीय सेमिनार में भारत के कोने-कोने से उर्दू के आलोचकों, कवियों और कहानीकारों ने भरपूर हिस्सा लिया और माबाद जदीदियत यानी पोस्ट मॉडर्निज़्म
उर्दू अफ़साने के तीन दौर
उर्दू अफ़साने के हर दौर में देखने के दो नज़रिए मान्य और लोकप्रिय रहे हैं। इनमें से एक नज़रिया तो ज़मीनी रुझान का प्रतिनिधि है और इसके तहत अफ़सानानिगार (कहानीकार) ने ज़िंदगी के रूपों को बहुत क़रीब से देखा है। इस तरह कि इन रूपों का खुरदरापन सबसे पहले उसकी
उर्दू और पंजाबी का बाहमी रिश्ता
उर्दू ज़बान और उसके अदब से पंजाबी ज़बान और उसके अदब का वही रिश्ता है जो सिंधु नदी से पंजाब की उन पांच नदियों का है जो पंचनद के मुक़ाम पर एक ही धारा में मिलकर आख़िरकार सिंधु नदी में जा गिरती हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिस तरह पंजाब पांच नदियों की सरज़मीन
बीसवीं सदी की अदबी तहरीकें
बीसवीं सदी की शुरुआत से पहले सर सैयद अहमद ख़ां की तहरीक ने एक दूसरी अदबी तहरीक को भी जन्म दिया जिसके साथ मौलाना हाली, शिबली, मुहम्मद हुसैन आज़ाद, इस्माइल मेरठी, नज़ीर अहमद और कुछ अन्य बड़े लोगों के नाम जुड़े थे। इस तहरीक को सुधारवादी तहरीक का नाम भी
उर्दू ग़ज़ल में महबूब का तसव्वुर
रूप और विषय से अलग हटकर, नज़्म और ग़ज़ल में एक फ़र्क़ यह भी है कि जहाँ नज़्म में महबूब की शख़्सियत की अपनी एक अलग पहचान होती है, वहाँ ग़ज़ल में वह कुछ सामान्य विशेषताओं से जुड़कर एक आदर्श रूप में सामने आती है। दूसरे शब्दों में, नज़्म के शायर की महबूबा
मंटो के अफ़सानों में औरत!
मीर के बहत्तर नश्तरों (चुभने वाले शेरों) का ज़िक्र बहुत सुना है मगर कितने लोग इन नश्तरों की पहचान के मामले में एक राय रखते हैं? बहुत कम? वजह यह है कि मीर के हर पाठक ने अपने तौर पर बहत्तर नश्तरों की एक सूची तैयार कर रखी है। यही एक बड़े रचनाकार की ख़ासियत
इसमत चुग़्ताई के निस्वानी किरदार
इस्मत चुग़ताई के ज़्यादातर महिला किरदारों की पृष्ठभूमि में एक ऐसी "औरत" मौजूद है जो घर की मशीन में महज़ एक बेनाम सा पुर्ज़ा बन कर नहीं रह गई, बल्कि जिसने अपने अलग वजूद का ऐलान करते हुए माहौल की तयशुदा कद्रों और रिवाज़ों को अगर ध्वस्त नहीं किया, तो कम
कल्चर का मस्अला
पिछले बीस बरसों में कल्चर के मसले पर हमारे यहाँ बहुत से लोगों ने अपने विचार प्रकट किए हैं और कभी-कभी तो नौबत कड़वे और तीखे विचार-विमर्श तक भी जा पहुँची है। लेकिन अभी तक कल्चर और उसके तकाज़ों के बारे में ग़लतफ़हमियाँ आम हैं, भावुकता अपने चरम पर है और
सक़ाफ़त, अदब और जमहूरियत
संस्कृति यानी कल्चर और प्रकृति यानी नेचर का टकराव और जुड़ाव हमेशा से नहीं है। संस्कृति का सिलसिला आज से महज़ चंद हज़ार साल पहले शुरू हुआ जबकि नेचर का दख़ल सदियों से है। इस धरती पर नेचर का एक अहम प्रतीकात्मक रूप जंगल है जो क्रम, दिशा और इतिहास के प्रभाव
मा'नी और तनाज़ुर
कला की ख़ास पहचान है... वक्र (curve)! और जो कला नहीं है, उसकी... लकीर! और वक्र और लकीर का यही फ़र्क़ कविता को गद्य से अलग भी करता है। आप पूछ सकते हैं कि क्या हर कविता वाक़ई कविता होती है और क्या हर गद्य-खंड कला के दायरे से ज़रूरी तौर पर बाहर माना जा