यगाना चंगेज़ी
ग़ज़ल 70
अशआर 60
मुसीबत का पहाड़ आख़िर किसी दिन कट ही जाएगा
मुझे सर मार कर तेशे से मर जाना नहीं आता
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सब्र करना सख़्त मुश्किल है तड़पना सहल है
अपने बस का काम कर लेता हूँ आसाँ देख कर
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दर्द हो तो दवा भी मुमकिन है
वहम की क्या दवा करे कोई
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बैठा हूँ पाँव तोड़ के तदबीर देखना मंज़िल क़दम से लिपटी है तक़दीर देखना आवाज़े मुझ पे कसते हैं फिर बंदगान-ए-इश्क़ पड़ जाए फिर न पाँव में ज़ंजीर देखना मुर्दों से शर्त बाँध के सोई है अपनी मौत हाँ देखना ज़रा फ़लक-ए-पीर देखना होश उड़ न जाएँ सनअत-ए-बेहज़ाद देख कर आईना रख के सामने तस्वीर देखना परवाने कर चुके थे सर-अंजाम ख़ुद-कुशी फ़ानूस आड़े आ गया तक़दीर देखना शायद ख़ुदा-न-ख़ास्ता आँखें दग़ा करें अच्छा नहीं नविश्ता-ए-तक़दीर देखना बाद-ए-मुराद चल चुकी लंगर उठाओ 'यास' फिर आगे बढ़ के ख़ूबी-ए-तक़दीर देखना
मुझे दिल की ख़ता पर 'यास' शरमाना नहीं आता पराया जुर्म अपने नाम लिखवाना नहीं आता मुझे ऐ नाख़ुदा आख़िर किसी को मुँह दिखाना है बहाना कर के तन्हा पार उतर जाना नहीं आता मुसीबत का पहाड़ आख़िर किसी दिन कट ही जाएगा मुझे सर मार कर तेशे से मर जाना नहीं आता दिल-ए-बे-हौसला है इक ज़रा सी ठेस का मेहमाँ वो आँसू क्या पिएगा जिस को ग़म खाना नहीं आता सरापा राज़ हूँ मैं क्या बताऊँ कौन हूँ क्या हूँ समझता हूँ मगर दुनिया को समझाना नहीं आता
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अगर अपनी चश्म-ए-नम पर मुझे इख़्तियार होता
अदब ने दिल के तक़ाज़े उठाए हैं क्या क्या
आँख दिखलाने लगा है वो फ़ुसूँ-साज़ मुझे
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