ज़ाहिद अबरोल के शेर
ख़ुद को तन्हा न समझ जाम उठा ले 'ज़ाहिद'
ऐसा साथी तो मुक़द्दर से मिला करता है
ज़ख़्म पल भर का दवा रोज़ दुआ बरसों तक
यूँ इलाज-ए-ग़म-ए-महबूब हुआ करता है
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