क़ादिर नामा-ए-ग़ालिब

मिर्ज़ा ग़ालिब

अल्वी प्रेस, भोपाल
1971 | अन्य
  • सहयोगी

    रेख़्ता

  • श्रेणियाँ

    बाल-साहित्य, शाइरी

  • पृष्ठ

    34

पुस्तक: परिचय

परिचय

غالب کے سات بچے تھے لیکن افسوس ان میں سے کوئی بھی پندرہ ماہ سے زائد تک نہ جیا اور غالب لا ولد ہی مرے۔ اپنی اسی تنہائی اور بعض دیگر وجوہات کی بنا پر غالب نے زین العابدین خاں عارف کو متبنیٰ بنا لیا تھا جو ان کی بیوی کے بھانجے تھے۔ لیکن عین شباب کے عالم میں پینتیس سال کی عمر میں، عارف بھی وفات پا گئے، اور انہی عارف مرحوم کے چھوٹے چھوٹے یتیم بچوں کے لیے غالب نے 'مثنوی قادر نامہ' لکھی تھی۔ دراصل یہ مثنوی ایک طرح کی لغت نامہ ہے جس میں غالب نے عام استعمال کے فارسی اور عربی الفاظ کے ہندی یا اردو مترادف بیان کیے ہیں تاکہ پڑھنے والوں کے ذخیرۂ الفاظ میں اضافہ ہو سکے۔

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लेखक: परिचय

मिर्ज़ा ग़ालिब

मीर तक़ी मीरके बाद उर्दू के सबसे बड़े शाइ, विश्व-कविता में उर्दू के हस्ताक्षर। शाइरी और ज़िंदगी दोनों में परम्परा-विरोधीअंदाज़ के लिए प्रख्यात। माली तौर पर परेशान और क़र्ज़ न लौटाने के कारण बार बार क़ानूनी कारवाई के शिकार रहे। जुवा खेलने खिलाने के इल्ज़ाम में क़ैद की सज़ा काटी। ज़ौक़के बाद बादशाह बहादुर शाह ज़फ़रके उस्ताद रहे।

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